Saturday, 5 August 2017

शीतकालीन सत्र में संसद में छाएगा निडाना का कीट ज्ञान का मॉडल

भाजपा के वरिष्ठ नेता जोशी हरियाणा के राज्यपाल व सीएम को चिट्टी लिखकर कीट मॉडल को प्रोत्साहित करने की करेंगे सिफारिस
--सितम्बर में कीट ज्ञान के मॉडल को देखने के लिए जींद आएंगे मुरली मनोहर जोशी

नरेंद्र कुंडू 

जींदजिले के निडाना गांव से शुरू हुई कीट ज्ञान की मुहिम आगामी शीतकालीन सत्र में संसद में चर्चा का विषय बनेगी। संसद में निडाना के कीट ज्ञान के मॉडल पर प्रदर्शनी लगाई जाएगी तथा इस दौरान सांसदों को भी कीटों का पाठ पढ़ाया जाएगा। भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने इस मामले को सिरे चढ़ाने के लिए भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नरेश सिरोह को जिम्मेदारी सौंपी है। संसद शीतकालीन सत्र से पूर्व मुरली मनोहर जोशी स्वयं निडाना आकर कीट ज्ञान मॉडल को देखेंगे। इस दौरान वह यहां के किसानों के साथ बैठक कर उनके अनुभव भी जानेंगे। वहीं कीट ज्ञान के इस मॉडल को प्रोत्साहित करने के लिए भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी हरियाणा के राज्यपाल प्रो. कप्तान ङ्क्षसह सोलंकी तथा मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को चिट्टी भी लिखेंगे ताकि फसलों में अंधाधुंध प्रयोग होने वाले कीटनाशकों को रोककर खाने की थाली को जहरमुक्त बनाया जा सके। 


गौरतलब है कि गत दिवस डॉ. सुरेंद्र दलाल कीट साक्षरता मिशन का एक प्रतिनिधि मंडल भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नरेश सिरोही के नेतृत्व में भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी से दिल्ली स्थित उनके आवास पर मिला था। इस दौरान बराह तपा के प्रधान कुलदीप ढांडा तथा समूह के प्रधान रणबीर मलिक ने भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी के साथ अपने अनुभव सांझा करते हुए बताया कि खाने की थाली को जहरमुक्त बनाने के लिए वर्ष 2008 में जींद जिले के निडाना गांव में कीट साक्षरता के अग्रदूत डॉ. सुरेंद्र दलाल ने यहां के किसानों के साथ मिलकर कीटों पर शोध शुरू किया था। इस दौरान उन्होंने किसानों के साथ मिलकर 206 किस्म के कीटों की पहचान की। इनमें 163 किस्म के मांसाहारी तथा 43 किस्म के शाकाहारी कीट शामिल हैं। उन्होंने बताया कि न तो कीट हमारे मित्र होते हैं और न ही शत्रु। पौधे अपनी जरूरत के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार की गंध छोड़कर कीटों को आकर्षित करते हैं। जब उनकी जरूरत पूरी हो जाती है तो वह शाकाहारी कीटों को नियंत्रित करने के लिए मांसाहारी कीटों को आकर्षित कर लेते हैं। मांसाहारी कीट शाकाहारी कीटों को खाकर उन्हें स्वयं ही नियंत्रित कर लेते हैं। शाकाहारी कीटों को नियंत्रित करने के लिए कीटनाशकों की कोई जरूरत नहीं है। उन्होंने बताया कि फसल में कीटनाशकों का प्रयोग करने से कीटों की संख्या कम होने की बजाए बढ़ती है। क्योंकि कीटनाशकों के छिड़काव से पौधे की गंध छोडऩे की क्षमता प्रभावित होती है। उन्होंने यह भी बताया कि फसलों में अत्याधिक कीटनाशकों का प्रयोग होने के कारण फसलों में जहर का स्तर लगातार बढ़ रहा है। हमारा खान-पान दूषित होने के कारण दिन-प्रतिदिन मनुष्य भिन्न-भिन्न प्रकार की बीमारियों की चपेट में आ रहा है तथा कई प्रकार की लाइलाज बीमारियां अपने पैर पसार रही हैं। रणबीर मलिक ने बताया कि वर्ष 2008 में निडाना से शुरू हुई यह मुहिम अब हरियाणा के साथ-साथ पंजाब में भी फैल चुकी है। यदि सरकार इस मुहिम को देशभर में लागू कर दे तो सरकार के हर वर्ष कीटनाशकों व रासायनिक उर्वरकों की सब्सिडी पर खर्च होने वाले करोड़ों रुपए बच जाएंगे। वहीं हमारा खान-पान भी दूषित नहीं होगा। भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने किसानों के साथ लगभग डेढ़ घंटे तक बातचीत कर व बारिकी से उनके अनुभव समझने के बाद संसद के शीतकालीन सत्र में कीटों की प्रदर्शनी लगाने तथा सांसदों को भी इस मुहिम से रूबरू करवाने का आश्वासन दिया। इसके लिए भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नरेश सिरोही को जिम्मेदारी भी सौंपी। वहीं उन्होंने हरियाणा प्रदेश के राज्यपाल कप्तान ङ्क्षसह सोलंकी तथा मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को चिट्टी लिखकर इस मुहिम को प्रोत्साहित करने का आश्वासन भी दिया। कीट ज्ञान के इस मॉडल को समझने के लिए भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी ने किसानों का जींद आने का निमंत्रण भी स्वीकार किया। भाजपा नेता सितंबर माह में स्वयं जींद आएंगे और किसानों के अनुभव सुनेंगे। 





Saturday, 24 June 2017

इंग्लैंड व अमेरिका के लोगों की पसंद बनी अटेरना की बेबी कॉर्न

खेती में अटेरना के कंवल सिंह ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बनाई पहचान
नरेंद्र कुंडू 
सोनीपत। हरियाणा के प्रतिष्ठित किसानाें की सूची में शामिल 55 वर्षीय अटेरना निवासी कंवल सिंह चौहान ने खेती के बूते अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। अपनी मेहनत के बल पर कंवल सिंह दर्जनभर से भी ज्यादा पुरस्कार हासिल कर चुका है। इतना ही नहीं गांव में ही स्थित कंवल सिंह की फूड प्रोसेसिंग कंपनी से हर रोज लगभग डेढ़ टन बेबी कॉर्न व अन्य उत्पाद इंग्लैंड व अमेरिका में सप्लाई हो रहे हैं। पर्यावरण नियंत्रण की राष्ट्रीय समिति के सदस्य कंवल सिंह चौहान ने बताया कि 1978 में पिता के देहांत के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई थी। उस समय उनकी उम्र महज 15 वर्ष थी और वह दसवीं कक्षा में पढ़ते थे। 
इसके बाद उन्होंने खेती के साथ-साथ अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। 1996 में उन्होंने राइस मिल लगाया लेकिन वहां सफलता नहीं मिली। वह पूरी तरह से कर्ज में डूब चुके थे। इसके बाद उन्हाेंने अपनी परंपरागत खेती छोड़ कर 1998 में मशरूम व बेबी कॉर्न की खेती शुरू की। मशरूम व बेबी कॉर्न से अच्छी आमदनी हुई। इसके बाद उन्होंने  कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। खेती के साथ-साथ मधु मक्खी पालन भी शुरू कर दिया। कंवल सिंह ने स्वयं के साथ-साथ दूसरे किसानाें को भी बेबी कॉर्न की खेती के लिए प्रेरित करना शुरू कर दिया। देखते ही देखते गांव के दूसरे किसानों ने भी बेबी कॉर्न की खेती शुरू कर दी। किसानाें को बेबी कॉर्न को बेचने के लिए किसी प्रकार की दिक्कत नहीं हो इसके लिए कंवल सिंह ने गांव में ही फूड प्रोसेसिंग यूनिट शुरू कर दी। जिसका उद्घाटन नार्वे के कृषि एवं खाद्य मंत्री लार्स पेडर ब्रेक ने वर्ष 2009 में किया। लगभग दो एकड़ में स्थित इस यूनिट में बेबी कॉर्न, स्वीट कॉर्न, पाइनएपल, फ्रूट कॉकटेल, मशरूम बटन, मशरूम स्लाइस सहित लगभग आठ प्रकार के उत्पाद तैयार किए जाते हैं।  इस यूनिट से प्रति दिन लगभग डेढ़ टन बेबी कॉर्न व अन्य उत्पाद इंग्लैंड व अमेरिका में निर्यात होता है। इस कार्य में उनके बड़े बेटे जैनेन्द्र जो कि फूड प्रोसेसिंग मे बीटेक हैं उनका पूरा साथ दे रहे हैं। इस समय इनके साथ 10 गांव के 136 किसान सदस्य के रूप में जुड़े हुए हैं जिनको यह न्यूनतम समर्थन मूल्य देकर उपज खरीदने का वादा करते हैं। कंवल सिंह का कहना है कि रासायन ऽाद आधारित खेती व कीटनाशकों की अधिकता खेती की लागत बढ़ा रही है। इसकी जगह यदि हम पशु आधारित तथा स्वयं द्वारा तैयार खाद का प्रयोग करें तो खेती किसानाें के लिए घाटे का सौदा नहीं रहेगी। 

व्यवसायिक खेती ने बदली किसानों की तकदीर

बेबी कॉर्न व स्वीट कॉर्न की खेती से अटेरना और मनोली के किसानों से विदेशों में भी बनाई पहचान 
नरेंद्र कुंडू 
सोनीपत।

आज खेती किसानों के लिए घाटे का सौदा बनती जा रही है। खेती में लागत अधिक होने तथा पैदावार कम होने के कारण किसान खेती से मुंह मोड़ने लगे हैं। लेकिन हरियाणा प्रदेश के सोनीपत जिले के दो गांव ऐसे हैं, जहां के किसानाें ने हरियाणा ही नहीं बल्कि पूरे एशिया के नक्शे पर अपनी सफलता की छाप छोड़ी है। दिल्ली-चंडीगढ़ नेशनल हाईवे-1 पर स्थित बहालगढ़ से महज तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित अटेरना तथा पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित मनोली के किसानाें ने खेती को व्यवसाय के तौर पर अपना लिया है। इन गांवाें के किसानों ने अपनी परंपरागत खेती को छोड़कर बेबी कॉर्न व स्वीट कॉर्न की खेती को अपनी आमदनी का जरिया बनाया है। इतना ही नहीं बेबी कॉर्न व स्वीट कॉर्न के उत्पादन में इन दोनों गांवों के किसानों ने इतनी प्रसिद्धी हासिल की है कि विदेशों से भी किसान यहां खेती का प्रशिक्षण लेने के लिए आते हैं। मनोली गांव निवासी दिनेश ने बताया कि बीएससी की  पढ़ाई के बाद से उसने नौकरी की बजाए खेती को व्यवसाय के तौर पर अपनाया। दिनेश ने बताया कि पहले उनके गांव मनोली में ज्यादातर क्षेत्र में धान की खेती होती थी। भारी मात्र में भूजल का दोहन होता था। इससे गांव का भूजल स्तर काफी नीचे चला गया था। इसको देखते हुए उसने खेती में कुछ अलग करने की ठानी। 1998 में स्ट्राबेरी की खेती शुरू की। इसके बाद उसने अपने दोस्त अरूण के साथ मिलकर स्वीट कॉर्न की खेती शुरू की। शुरूआत में मार्केटिंग को लेकर थोड़ी दिक्कत हुई लेकिन बाद में फूड प्रोसेसिंग कंपनियों के साथ सीधे सम्पर्क होने से उनकी मार्केट की समस्या भी खत्म हो गई। देखते ही देखते स्वीट कॉर्न की खेती उनके लिए फायदे का सौदा साबित होने लगी। इसके बाद उन्होंने दूसरे किसानाें को भी इसके लिए प्रेरित किया। उन्हाेंने बताया कि 4500 की आबादी वाले इस गांव के अधिकतर किसान स्वीट कॉर्न की खेती कर रहे हैं। इससे फसलाें में कीटनाशकाें का प्रयोग बिल्कुल बंद हो गया। पानी की लागत कम होने से भूजल का दोहन बंद हो गया। जमीन का स्वास्थ्य स्तर सुधरने लगा। वातावरण स्वच्छ होने लगा। गांव में ही लोगाें को रोजगार मिलने से गांव से लोगाें का पलायन बंद हो गया। पशुआें को पूरे साल हरा चारा मिलता है, इससे पशुओं के दूध उत्पादन क्षमता में भी बढ़ोतरी हुई है।

अब बागवानी के लिए भी करेंगे किसानों को प्रेरित 
किसान अरुण, दिनेश, जयद्रथ, प्रवीण व पवन ने बताया कि उन्होंने किसानों का एक ग्रुप बनाया हुआ है। इस ग्रुप में शामिल सभी किसानों द्वारा अपने खेतों में पॉली हाऊस भी लगाए हुए हैं। पॉली हाऊस में उगने वाली सब्जियों में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग करने की बजाए बॉयोगैस से निर्मित देशी खाद का प्रयोग करते हैं। इस खाद को घोल कर ड्रिप के जरिये पानी के साथ सब्जियों पर इसका छिड़काव किया जाता है। इसके अलावा कुछ किसानों द्वारा बाग भी लगाए हुए हैं। सब्जियों व स्वीट कॉर्न की खेती के साथ-साथ अब वह किसानाें को बागवानी के लिए भी प्रेरित कर रहे हैं।
फसल चक्र बदलने से इन गांवों को यह हुआ फायदा
 फसल चक्र में बदलाव से जमीन का स्वास्थ्य स्तर सुधरा है। धान की रोपाई बंद होने से पानी की बचत हुई है। पशुओं के लिए हर माह हरा चारा प्रचुर मात्र में उपलब्ध रहता है। कीटनाशकों का प्रयोग बंद हो गया है। वातावरण में सुधार हुआ है। गांव में ही लोगों को रोजगार मिलने से गांव के लोगों का पलायन रूका है। कैश की फसल का चलन बढ़ने से गांव का आर्थिक स्तर सुधरा है। फूड प्रोसेसिंग कंपनियाें द्वारा सब्जियों के उत्पादन के लिए सीधे किसानों से संपर्क किए जाने से किसानाें को उत्पाद बेचने के लिए एक नई मार्केट उपलब्ध हो गई। बाजार भाव कम रहने के दिनों में प्रोसेसिंग प्लांट में फसल बेचने से आर्थिक नुक्सान नहीं होता।
किसान की फूड, फीड, फोडर, फ्रयूल, फाइनेंस की चिंता खत्म
सेवानिवृत्त कृषि वैज्ञानिक डॉ- साईं दास ने कहा कि अटेरना व मनोली के किसानों ने आस-पास के क्षेत्रें में भी रोजगार की असीमित संभावनाएं पैदा कर यह दिखा दिया है कि स्वप्न केवल देखने के लिए ही नहीं होते किंतु उन्हें धरातल पर भी उतारा जा सकता है। आने वाला समय मक्का खेती का है।। क्योंकि इसमें पानी की लागत तथा रसायनिक खाद एवं कीटनाशकों का प्रयोग नामात्र है और आर्थिक लाभ अधिकतम है। किसान को फूड, फीड, फोडर, फ्रयूल, फाइनेंस की चिंता करने की भी आवश्यकता नहीं है। यदि हम खेती में संतुलित पोषक तत्व डालते रहें तो हमें अनावश्यक खर्चों से निजात मिल जाएगी।


किसानों द्वारा 10 वर्षों से हो रहा कीटों पर शोध

फसल में कीट ज्ञान पद्धति अपना कर किसान चार गुना तक कम कर सकते हैं लागत 
थाली को जहरमुक्त बनाने की जींद के किसानाें की अनूठी मुहिम

नरेंद्र कुंडू 
जींद।
किसानों द्वारा अधिक उत्पादन की चाह में फसलाें में अंधाधुंध रासायनिक उर्वरकाें व कीटनाशकाें का प्रयोग किया जाता है। इससे फसल में लागत अधिक बढ़ती जा रही है और उत्पादन कम होता जा रहा है। इससे किसान कर्ज के दलदल में फंसकर आर्थिक तौर पर कमजोर हो रहे हैं। लेकिन जींद जिले के किसानों द्वारा फसल में लागत को कम कर उत्पादन बढ़ाने के लिए कीट ज्ञान की अनोखी पद्धति इजाद की गई है। यहां के किसान पिछले दस वर्षों से फसलों में मौजूद कीटों पर शोध कर रहे हैं। वर्ष 2008 में कृषि विकास अधिकारी डॉ- सुरेंद्र दलाल के नेतृत्व में निडाना गांव में कीटों पर शोध का कार्य शुरू किया गया था। इस मुहिम के साथ आस-पास के दर्जनभर से ज्यादा गांवों के पुरुष व महिला किसान जुड़े हुए हैं। कीटाचार्य रणबीर मलिक, सुरेश,  रामदेवा, जगमेंद्र, सविता, अंग्रेजो, मनीषा इत्यादि का कहना है कि फसल के लिए भी कीट जरूरी हैं क्योंकि कीटों के बिना खेती संभव नहीं है। पौधे अपनी जरूरत के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार की गंध छोड़कर कीटों को आकृषित करते हैं। कीट दो प्रकार के होते हैं। एक शाकाहारी तथा दूसरे मांसाहारी। शाकाहारी पौधों, फल, फूलों को खाकर अपना जीवन यापन करते हैं तो मांसाहारी कीट शाकाहारी कीटों को खाकर अपना जीवनचक्र चलाते हैं। यदि किसान शाकाहारी कीटों को नियंत्रित करने के लिए किसी प्रकार के कीटनाशकों का प्रयोग नहीं करे तो मांसाहारी कीट उन्हें स्वयं ही नियंत्रित कर लेते हैं। कीटनाशकाें के प्रयोग से कीटों की संख्या कम होने की बजाए उल्टी बढ़ती है। मांसाहारी कीट फसल में कुदरती कीटनाशी का काम करते हैं। उन्होंने अभी तक 43 किस्म के शाकाहारी तथा 163 किस्म के मांसाहारी कीटों की पहचान कर उनके क्रियाकलापों से फसल पर पड़ने वाले प्रभाव पर काफी गहराई से शोध किया है। उत्पादन बढ़ाने में कीटनाशकों का कोई योगदान नहीं है। उत्पादन बढ़ाने के लिए पौधों को पोषक तत्व की जरूरत पड़ती है। इनकी इस पद्धति पर मोहर लगाने वालीो राष्ट्रीय समेकित नाशीजीव प्रबंधन अनुसंधान केंद्र द्वारा जारी की गई रिपोर्ट में यह दर्शाया गया है कि इन किसानों द्वारा चलाई जा रही कीट ज्ञान की पद्धति को अपनाकर किसान फसल मे रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों पर होने वाले खर्च को चार गुणा तक कम कर डेढ़ गुणा तक उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। वहीं   रासायनिक उर्वरकों से दूषित होने वाले खान-पान व वातावरण को भी बचाया जा सकता है।


पंजाब में भी दे रहे कीट ज्ञान का प्रशिक्षण
पिछले दो वर्षों से जींद जिले के कीटाचार्य किसान अपने खर्च पर पंजाब के भठिंडा, मानसा व बरनाला जिलों में किसान खेत पाठशालाएं चलाकर किसानों को कीट ज्ञान की शिक्षा दे रहे हैं। कीट ज्ञान के सहारे किसानों द्वारा कपास, धान, गेहूं, गन्ना तथा सब्जियों की फसलों में बिना कीटनाशकाें का प्रयोग कर अच्छा उत्पादन लिया जा रहा है।  





Monday, 16 January 2017

ऐसे कैसे होगा गांवों का विकास

--अभी तक 301 में से महज 15 पंचायतों की जीपीडीपी हुई तैयार

--बिना जीपीडीपी के पंचायतों को नहीं मिल पाएगी विकास के लिए ग्रांट

--छह माह पहले दिए थे जीपीडीपी बनाने के आदेश

नरेंद्र कुंडू
जींद।
गांवों के विकास का खाका तैयार करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई ग्राम पंचायत विकास योजना (जीपीडीपी) में पंचायत अधिकारी व ग्राम सचिव रूची नहीं दिखा रहे हैं। जीपीडीपी योजना के शुरू होने के छह माह बाद भी अभी तक जिले के 301 ग्राम पंचायतों में से महज 15 ग्राम पंचायतों की ही जीपीडीपी तैयार हो पाई है। ग्राम पंचायजों की जीपीडीपी तैयार नहीं होने के कारण गांव के विकास कार्यों पर ब्रेक लग गए हैं।  

यह है जीपीडीपी योजना 

ग्राम पंचायतों द्वारा पहले बिना प्लानिंग के ही विकास कार्य करवाए जाते थे। गांव के विकास के लिए किसी तरह की कोई प्लानिंग नहीं होती थी। केवल ग्राम सभा में ही गांव के विकास कार्यों पर चर्चा की जाती थी। पंचायत के पास विकास कार्यों की प्लानिंग नहीं होने के कारण कई बार सबसे जरूरी कार्य नहीं हो पाते थे। इस समस्या को दूर करने तथा गांवों का विकास करवाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा गत वर्ष मई माह में ग्राम पंचायत विकास योजना (जीपीडीपी) शुरू की गई थी। इस योजना के तहत ग्राम पंचायत द्वारा गांव में एक वर्ष में होने वाले विकास कार्यों की रूपरेखा तैयार की जानी थी। ताकि सबसे ज्यादा जरूरी कार्यों को प्राथमिकता के आधारा पर पूरा करवाया जा सके। ग्राम पंचायत द्वारा तैयार की गई विकास कार्यों की लिस्ट के आधार पर ही सरकार द्वारा गांव के विकास के लिए ग्रांट जारी की जानी है। ग्राम पंचायत द्वारा तैयार की गई विकास कार्यों की लिस्ट के आधार पर ग्राम सचिव द्वारा गांव के विकास की जीपीडीपी तैयार कर विभाग की वेबसाइट पर अपलोड की जानी है। इसी जीपीडीपी के आधार पर गांव के विकास के लिए ग्रांट जारी होगी और यह ग्रांट केवल इसी कार्य पर खर्च हो सकेगी। 

 विकास कार्यों की रूपरेखा तैयार की जानी है।

ग्राम पंचायत तथा ग्राम सचिव द्वारा जीपीडीपी के तहत गांव में एक वर्ष में होने वाले विकास कार्यों की रूपरेखा तैयार की जानी है। जीपीडीपी में तैयार की गई प्लानिंग के आधार पर गांव में जो सबसे जरूरी कार्य होते हैं पहले उन विकास कार्यों के लिए सरकार द्वारा ग्रांट जारी की जानी है। ताकि गांव के जरूरी कार्यों को प्राथमिकता के आधार पर पूरा करवाया जा सके। अभी तक जिले की 15 पंचायतों की जीपीडीपी तैयार हुई है। सभी पंचायत अधिकारियों व ग्राम सचिवों को जल्द से जल्द जीपीडीपी तैयार करने के आदेश दिए गए हैं। जल्द ही सभी की जीपीडीपी तैयार करवाकर वेबसाइट पर डलवा दी जाएगी।

वेबसाइड पर डाली गई गांव के विकास के लिए तैयार की गई जीपीडीपी।
शंकर गोयल, जिला पंचायत एवं विकास अधिकारी
जींद

पीने के पानी की समस्या के समाधान के तैयार किया था प्रस्ताव

गांव में पीने के पानी की गंभीर समस्या है। पीने के पानी की समस्या के समाधान के लिए पंचायत ने गांव में पेयजल सप्लाई शुरू करवाने के लिए पाइप लाइन दबवाने के लिए प्रस्ताव तैयार कर बीडीपीओ के पास भेजा था लेकिन अभी तक उनके प्रस्ताव पर कोई अमल नहीं हुआ है। 
शीशपाल सरपंच,
ग्राम पंचायत कुचराना कलां

 गंदे नालों का नहीं हो पाया निर्माण

गांव में गंदे पानी की निकासी की समस्या गंभीर है। गलियों में गंदा पानी भरा रहने के कारण गलियों में कीचड़ पनप रहा है। गंदे पानी की निकासी के लिए गंदे नालों के निर्माण के लिए ग्राम पंचायत ने प्रस्ताव तैयार कर प्रशासन को भेजा था लेकिन अभी तक उनके प्रस्ताव पर कोई अमल नहीं हुआ है और न ही प्रशासन की तरफ से नालों के निर्माण के लिए कोई ग्रांट आई है।
राजकुमार, सरपंच
ग्राम पंचायत बिघाना

अलेवा व उचाना फिसड्डी, जुलाना व पिल्लूखेड़ा से एक-एक ही पंचायत की हुई जीपीडीपी तैयार

गांवों के विकास कार्यों के लिए केंद्र सरकार द्वारा लागू की गई जीपीडीपी को तैयार करने के लिए अलेवा व उचाना सबसे फिसड्डी हैं। अभी तक अलेवा व उचाना से एक भी ग्राम पंचायत की जीपीडीपी तैयार नहीं हो पाई है। पिल्लूखेड़ा तथा जुलाना से केवल एक-एक ही ग्राम पंचायत की जीपीडीपी तैयार हुई है। जीपीडीपी तैयार करने में नरवाना ब्लॉक सबसे आगे है। 15 में से अकेली 11 जीपीडीपी नरवाना ब्लॉक की तैयार हुई हैं।
बॉक्स
अभी तक इन-इन गांवों की हुई है जीपीडीपी तैयार
ब्लॉक का नाम        पंचायत का नाम
जुलाना                खरेंटी
जुलाना                रामकली
नरवाना                बरटा
नरवाना                धाबीटेक सिंह
नरवाना                धनौरी
नरवाना                डिंडोली
नरवाना                फरैन कलां
नरवाना                हमीरगढ़
नरवाना                कान्हाखेड़ा
नरवाना                कर्मगढ़
नरवाना                नारायणगढ़
नरवाना                नेहरा
नरवाना                रेवर
पिल्लूखेड़ा                आलनजोगीखेड़ा
सफीदों                खेड़ाखेमावती

ओलंपिक में गोल्ड लाने का सपना पूरा नहीं हुआ तो खोल दिया अखाड़ा

रेलवे की नौकरी के साथ अपने खर्च पर पहलवान तराश रहा नरेंद्र

--देश को मैडल दिलवाने के लिए अखाड़े में बहा रहे हैं पसीना

--कॉमनवेल्थ में गोल्ड मेडल जीत चुका है नरेंद्र

--नरेंद्र की उपलब्धियों को देखते हुए सरकार ने 2000 में भीम अवार्ड से किया सम्मानित

नरेंद्र कुंडू
जींद। ओलंपिक गेम में गोल्ड लाने का सपना पूरा नहीं हुआ तो पहलवान नरेंद्र ने खुद का अखाड़ा शुरू कर दिया। अब देश को ओलंपिक में गोल्ड दिलवाने के लिए अपने खर्च पर पहलवानों को तरास रहा है। हालांकि दो दशक पहले कॉमनवेल्थ गेम में नरेंद्र ने देश की झोली में गोल्ड मैडल डालने का काम किया था। कुश्ती में देश को अधिक से अधिक मैडल दिलवाने के लिए नरेंद्र खिलाडिय़ों के साथ अखाड़े में दिन-रात पसीना बहा रहा है। नरेंद्र का सपना कुश्ती में देश को ओलंपिक में गोल्ड दिलवाने का है। इसलिए पहलवान नरेंद्र बिना किसी प्रकार की सरकारी सहायता के अपने खर्च पर यह अखाड़ा चला रहा है। इस समय नरेंद्र के अखाड़े में दो दर्जन से भी अधिक खिलाड़ी कुश्ती का प्रशिक्षण ले रहे हैं। हाल ही में दिल्ली में आयोजित ग्रेपलिंग चैंपियनशिप में भी नरेंद्र के तीन पहलवानों ने गोल्ड, सिल्वर व रजत पदक जीत कर देश में प्रदेश व जिले का नाम रोशन करने का काम किया है। कुश्ती के क्षेत्र में नरेंद्र की उपलब्धियों को देखते हुए सरकार द्वारा वर्ष 2000  में नरेंद्र को भीम अवार्ड से नवाजा जा चुका है।  
  अपने अखाड़े में खिलाडिय़ों को प्रशिक्षण देते पहलवान नरेंद्र।

पूर्वजों से विरासत में मिले कुश्ती के गुर

गांव पड़ाना निवासी नरेंद्र पहलवान ने बताया कि उसे कुश्ती के गुर अपने पूर्वजों से विरासत में मिले हैं। उसके पिता मीर सिंह तथा चाचा दिलबाग सिंह भी कुश्ती के अच्छे पहलवान थे। नरेंद्र ने अपने चाचा दिलबाग से कुश्ती का प्रशिक्षण प्राप्त कर राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना परचम लहराया। नरेंद्र ने 1984 में पहली बार जिला स्तरीय चैंपियनशिप में प्रतिभागिता की थी और इस प्रतियोगिता में नरेंद्र ने गोल्ड मैडल हासिल किया था। इसके बाद नरेंद्र ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। कुश्ती के क्षेत्र में नरेंद्र के उत्कृष्ट प्रदर्शन को देखते हुए रेलवे ने 1992  में नरेंद्र को चीफ टिकट इंस्पेक्टर (सीटीआई) के पद पर नौकरी दे दी।
अपने अखाड़े में खिलाडिय़ों को प्रशिक्षण देते पहलवान नरेंद्र।

खेल में राजनीति के कारण ओलंपिक में नहीं ले पाया हिस्सा

पहलवान नरेंद्र ने बताया कि खेलों में आज भी राजनीति होती है और पहले भी राजनीति होती थी। कोच अपने चहेतों को आगे बढ़ाने के लिए अच्छे खिलाडिय़ों को नजरअंदाज कर देते हैं। नरेंद्र ने बताया कि अब खेलों में वीडियोग्राफी शुरू होने से पारदर्शिता को बढ़ावा मिला है। जबकि पहले वीडियोग्राफी नहीं होती थी। इसलिए कोच पहले अपनी मनमर्जी चलाते थे। वह खुद भी कई बार कोच की मनमर्जी का शिकार हुए हैं। कोच की राजनीति के चलते ही वह ओलंपिक में भाग नहीं ले पाए। नरेंद्र ने बताया कि खेल में राजनीति के चलते ही उसे इंटरनेशनल कुश्ती में जबरदस्ती हरवा दिया गया था। नरेंद्र ने बताया कि ओलंपिक में देश को गोल्ड दिलवाने के अपने सपने को साकार करने के लिए ही उसने अपना अखाड़ा शुरू किया है। इसलिए वह अखाड़े में खिलाडिय़ों को निशुल्क प्रशिक्षण दे रहे हैं।

यह हैं पहलवन नरेंद्र की उपलब्धियां

1981  में दिल्ली में आयोजित कैडेट चैंपियनशिप में गोल्ड
1992  में कोलंबिया में आयोजित जूनियर वल्र्ड चैंपियनशिप में ब्रांज मैडल
1992  में नेशनल चैंपियनशिप में सिल्वर मैडल
1993  में नेशनल चैंपियनशिप में प्रतिभागिता की
1994  नेशनल चैंपियनशिप में ब्रांज मैडल
1994  में नेशनल गेम्ज में गोल्ड मैडल
1994  में चाइना में आयोजित एशिया चैंपियनशिप में ब्रांज
1995  में दिल्ली में आयोजित नेशनल चैंपियनशिप में गोल्ड मैडल
1995  में आस्ट्रेलिया में आयोजित कॉमनवेल्थ में गोल्ड
1996  में नेशनल चैंपियनशिप में गोलड मैडल
1998  में नेशनल चैंपियनशिप में ब्रांज

गांव की पहली एमबीबीएस डॉक्टर बन सपना ने पेश की महिला सशक्तिकरण की मिशाल

गांव का गौरव

--बीडीएस में दाखिला होने के बाद भी कम नहीं हुई एमबीबीएस बनने की चाह, दोबारा से दी परीक्षा और एमबीबीएस के लिए हो गया चयन 

--ग्रामीण परिवेश में रहकर परिस्थितियों का डटकर किया मुकाबला

--सुविधाओं के अभाव को भी नहीं बनने दिया रास्ते का रोड़ा 

नरेंद्र कुंडू
जींद।
जिले के पिल्लूखेड़ा खंड के छोटे से गांव भूराण निवासी सपना ने एमबीबीएस के लिए अपना चयन करवाकर समाज के सामने यह साबित कर दिखाया है कि आज लड़कियां किसी भी क्षेत्र में लड़कों से पीछे नहीं हैं। लगभग तीन हजार की आबादी वाले इस गांव से एमबीबीएस डॉक्टर बनने वाली सपना गांव की पहली लड़की है। सपना का सपना था एमबीबीएस डॉक्टर बनने का लेकिन जब एमबीबीएस के लिए उसका चयन नहीं हुआ तो उसने बीडीएस में दाखिला ले लिया। बीडीएस में दाखिला लेने के बाद भी सपना की एमबीबीएस बनने की चाह कम नहीं हुई। सपना ने दोबारा मेहनत की और एमबीबीएस में दाखिला लेकर यह साबित कर दिया कि यदि इंसान कुछ हासिल करने की ठान ले और सच्ची लग्न से मेहनत करे तो दुनिया की कोई भी ताकत उसको उसकी मंजिल प्राप्त करने से नहीं रोक सकती। एमबीबीएस डॉक्टर बनकर धन कमाना सपना का लक्ष्य नहीं है। बल्कि सपना डॉक्टर बनकर समाज की सेवा करना चाहती है। इस समय सपना अग्रोहा के मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही और यह उसकी पढ़ाई का तीसरा वर्ष चल रहा है।
सपना ने अपनी दसवीं कक्षा तक की पढ़ाई गांव के ही एक निजी स्कूल से और मैडिकल संकाय की 12वीं कक्षा की पढ़ाई कन्या गुरुकुल सीनियर सैकेंडरी स्कूल खानपूर कलां से पास की और १२वीं के परीक्षा परिणाम में सपना ने 96.2 प्रतिशत अंक लेकर पूरे गुरूकुल में टॉप किया था। ग्रामीण परिवेश से संबंध रखने वाली सपना ने मैडिकल संकाय में पूरे गुरुकुल में टॉप कर यह साबित कर दिया है कि ग्रामीण क्षेत्र में भी प्रतिभा की कमी नहीं है। सपना ने दिन-रात कड़ी मेहनत कर यह उपलब्धि प्राप्त की है। सपना पिछली कक्षाओं में भी टॉपर रही है। सपना 12वीं कक्षा तथा 10वीं कक्षा में भी 96.2 प्रतिशत अंक हासिल कर क्षेत्र में अपनी सफलता के झंडे गाड़ चुकी है।

ताऊ से मिली प्रेरणा

साधारण परिवार व ग्रामीण परिवेश से संबंध रखने वाली सपना प्रतिभा की धनी है। सपना को डॉक्टर बनने की प्रेरणा अपने ताऊ प्रेम सिंह कुंडू से मिली। प्रेम ङ्क्षसह कुंडू स्वास्थ्य विभाग से हेल्थ निरीक्षक के पद से सेवानिवृत्ति हो चुके हैं। प्रेम सिंह ने एक अच्छे मार्गदर्शक की तरह पथ-पथ पर सपना का मार्ग दर्शन करते हुए उसे निरंतर कड़ी मेहनत करते हुए आगे बढऩे के लिए प्रेरित भी किया। अपने ताऊ से प्रेरणा लेकर सपना लगातार अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ती चली गई। एकलव्य की तरह सपना ने अपना पूरा ध्यान अपने लक्ष्य पर केंद्रीत कर कठोर परिश्रम किया। अपनी मेहनत के बूते ही आज सपना अपने लक्ष्य के बिल्कुल करीब पहुंच चुकी है। एमबीबीएस की पढ़ाई का उसका यह तीसरा वर्ष चल रहा है और आगामी दो वर्षों के बाद सपना के हाथ में एमबीबीएस की डिग्री होगी।

कभी नहीं लिया एक्सट्रा कक्षा का सहारा 

सपना की एक खास बात यह भी है कि सपना ने अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए कभी किसी एक्सट्रा कक्षा या ट्यूशन का सहारा नहीं लिया। सपना ने अपनी सफलता का श्रेय अपने अध्यापकों व अपने परिवार के सदस्यों को देते हुए बतया कि उसने कभी भी अतिरिक्त कक्षाओं का सहारा नहीं लिया। सपना ने बताया कि मैडिकल संकाय में सफलता प्राप्त करने के लिए अधिकतर बच्चे ट्यूशन या एक्सट्रा कक्षाएं लगाते हैं, तब जाकर कहीं उन्हें सफलता हासिल होती है। लेकिन उसने अपनी १२वीं कक्षा तक की पढ़ाई के दौरान कभी भी ट्यूशन या एक्सट्रा कक्षा का सहारा नहीं लिया, बल्कि उसने दिन-रात कड़ी मेहनत कर यह मुकाम हासिल किया है।

डटकर किया परिस्थितियों का सामना

सपना ग्रामीण परिवेश के एक साधारण परिवार से संबंध रखती है। सपना की मां गृहणी है और पिता पानीपत में एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते हैं। ग्रामीण परिवेश में होने के कारण सपना को पढ़ाई के लिए सही माहोल व उपयुक्त सुविधाएं नहीं मिल सकी लेकिन सपना ने कभी भी न तो माहोल की परवा की और न ही सुविधाओं के अभाव को पढ़ाई पर हावी होने दिया। सपना ने परिस्थितियों का डटकर सामना किया और लगातार कठोर परिश्रम करते हुए पढ़ाई के क्षेत्र में अपना परचम लहराया।