Monday, 16 January 2017

ऐसे कैसे होगा गांवों का विकास

--अभी तक 301 में से महज 15 पंचायतों की जीपीडीपी हुई तैयार

--बिना जीपीडीपी के पंचायतों को नहीं मिल पाएगी विकास के लिए ग्रांट

--छह माह पहले दिए थे जीपीडीपी बनाने के आदेश

नरेंद्र कुंडू
जींद।
गांवों के विकास का खाका तैयार करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई ग्राम पंचायत विकास योजना (जीपीडीपी) में पंचायत अधिकारी व ग्राम सचिव रूची नहीं दिखा रहे हैं। जीपीडीपी योजना के शुरू होने के छह माह बाद भी अभी तक जिले के 301 ग्राम पंचायतों में से महज 15 ग्राम पंचायतों की ही जीपीडीपी तैयार हो पाई है। ग्राम पंचायजों की जीपीडीपी तैयार नहीं होने के कारण गांव के विकास कार्यों पर ब्रेक लग गए हैं।  

यह है जीपीडीपी योजना 

ग्राम पंचायतों द्वारा पहले बिना प्लानिंग के ही विकास कार्य करवाए जाते थे। गांव के विकास के लिए किसी तरह की कोई प्लानिंग नहीं होती थी। केवल ग्राम सभा में ही गांव के विकास कार्यों पर चर्चा की जाती थी। पंचायत के पास विकास कार्यों की प्लानिंग नहीं होने के कारण कई बार सबसे जरूरी कार्य नहीं हो पाते थे। इस समस्या को दूर करने तथा गांवों का विकास करवाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा गत वर्ष मई माह में ग्राम पंचायत विकास योजना (जीपीडीपी) शुरू की गई थी। इस योजना के तहत ग्राम पंचायत द्वारा गांव में एक वर्ष में होने वाले विकास कार्यों की रूपरेखा तैयार की जानी थी। ताकि सबसे ज्यादा जरूरी कार्यों को प्राथमिकता के आधारा पर पूरा करवाया जा सके। ग्राम पंचायत द्वारा तैयार की गई विकास कार्यों की लिस्ट के आधार पर ही सरकार द्वारा गांव के विकास के लिए ग्रांट जारी की जानी है। ग्राम पंचायत द्वारा तैयार की गई विकास कार्यों की लिस्ट के आधार पर ग्राम सचिव द्वारा गांव के विकास की जीपीडीपी तैयार कर विभाग की वेबसाइट पर अपलोड की जानी है। इसी जीपीडीपी के आधार पर गांव के विकास के लिए ग्रांट जारी होगी और यह ग्रांट केवल इसी कार्य पर खर्च हो सकेगी। 

 विकास कार्यों की रूपरेखा तैयार की जानी है।

ग्राम पंचायत तथा ग्राम सचिव द्वारा जीपीडीपी के तहत गांव में एक वर्ष में होने वाले विकास कार्यों की रूपरेखा तैयार की जानी है। जीपीडीपी में तैयार की गई प्लानिंग के आधार पर गांव में जो सबसे जरूरी कार्य होते हैं पहले उन विकास कार्यों के लिए सरकार द्वारा ग्रांट जारी की जानी है। ताकि गांव के जरूरी कार्यों को प्राथमिकता के आधार पर पूरा करवाया जा सके। अभी तक जिले की 15 पंचायतों की जीपीडीपी तैयार हुई है। सभी पंचायत अधिकारियों व ग्राम सचिवों को जल्द से जल्द जीपीडीपी तैयार करने के आदेश दिए गए हैं। जल्द ही सभी की जीपीडीपी तैयार करवाकर वेबसाइट पर डलवा दी जाएगी।

वेबसाइड पर डाली गई गांव के विकास के लिए तैयार की गई जीपीडीपी।
शंकर गोयल, जिला पंचायत एवं विकास अधिकारी
जींद

पीने के पानी की समस्या के समाधान के तैयार किया था प्रस्ताव

गांव में पीने के पानी की गंभीर समस्या है। पीने के पानी की समस्या के समाधान के लिए पंचायत ने गांव में पेयजल सप्लाई शुरू करवाने के लिए पाइप लाइन दबवाने के लिए प्रस्ताव तैयार कर बीडीपीओ के पास भेजा था लेकिन अभी तक उनके प्रस्ताव पर कोई अमल नहीं हुआ है। 
शीशपाल सरपंच,
ग्राम पंचायत कुचराना कलां

 गंदे नालों का नहीं हो पाया निर्माण

गांव में गंदे पानी की निकासी की समस्या गंभीर है। गलियों में गंदा पानी भरा रहने के कारण गलियों में कीचड़ पनप रहा है। गंदे पानी की निकासी के लिए गंदे नालों के निर्माण के लिए ग्राम पंचायत ने प्रस्ताव तैयार कर प्रशासन को भेजा था लेकिन अभी तक उनके प्रस्ताव पर कोई अमल नहीं हुआ है और न ही प्रशासन की तरफ से नालों के निर्माण के लिए कोई ग्रांट आई है।
राजकुमार, सरपंच
ग्राम पंचायत बिघाना

अलेवा व उचाना फिसड्डी, जुलाना व पिल्लूखेड़ा से एक-एक ही पंचायत की हुई जीपीडीपी तैयार

गांवों के विकास कार्यों के लिए केंद्र सरकार द्वारा लागू की गई जीपीडीपी को तैयार करने के लिए अलेवा व उचाना सबसे फिसड्डी हैं। अभी तक अलेवा व उचाना से एक भी ग्राम पंचायत की जीपीडीपी तैयार नहीं हो पाई है। पिल्लूखेड़ा तथा जुलाना से केवल एक-एक ही ग्राम पंचायत की जीपीडीपी तैयार हुई है। जीपीडीपी तैयार करने में नरवाना ब्लॉक सबसे आगे है। 15 में से अकेली 11 जीपीडीपी नरवाना ब्लॉक की तैयार हुई हैं।
बॉक्स
अभी तक इन-इन गांवों की हुई है जीपीडीपी तैयार
ब्लॉक का नाम        पंचायत का नाम
जुलाना                खरेंटी
जुलाना                रामकली
नरवाना                बरटा
नरवाना                धाबीटेक सिंह
नरवाना                धनौरी
नरवाना                डिंडोली
नरवाना                फरैन कलां
नरवाना                हमीरगढ़
नरवाना                कान्हाखेड़ा
नरवाना                कर्मगढ़
नरवाना                नारायणगढ़
नरवाना                नेहरा
नरवाना                रेवर
पिल्लूखेड़ा                आलनजोगीखेड़ा
सफीदों                खेड़ाखेमावती

ओलंपिक में गोल्ड लाने का सपना पूरा नहीं हुआ तो खोल दिया अखाड़ा

रेलवे की नौकरी के साथ अपने खर्च पर पहलवान तराश रहा नरेंद्र

--देश को मैडल दिलवाने के लिए अखाड़े में बहा रहे हैं पसीना

--कॉमनवेल्थ में गोल्ड मेडल जीत चुका है नरेंद्र

--नरेंद्र की उपलब्धियों को देखते हुए सरकार ने 2000 में भीम अवार्ड से किया सम्मानित

नरेंद्र कुंडू
जींद। ओलंपिक गेम में गोल्ड लाने का सपना पूरा नहीं हुआ तो पहलवान नरेंद्र ने खुद का अखाड़ा शुरू कर दिया। अब देश को ओलंपिक में गोल्ड दिलवाने के लिए अपने खर्च पर पहलवानों को तरास रहा है। हालांकि दो दशक पहले कॉमनवेल्थ गेम में नरेंद्र ने देश की झोली में गोल्ड मैडल डालने का काम किया था। कुश्ती में देश को अधिक से अधिक मैडल दिलवाने के लिए नरेंद्र खिलाडिय़ों के साथ अखाड़े में दिन-रात पसीना बहा रहा है। नरेंद्र का सपना कुश्ती में देश को ओलंपिक में गोल्ड दिलवाने का है। इसलिए पहलवान नरेंद्र बिना किसी प्रकार की सरकारी सहायता के अपने खर्च पर यह अखाड़ा चला रहा है। इस समय नरेंद्र के अखाड़े में दो दर्जन से भी अधिक खिलाड़ी कुश्ती का प्रशिक्षण ले रहे हैं। हाल ही में दिल्ली में आयोजित ग्रेपलिंग चैंपियनशिप में भी नरेंद्र के तीन पहलवानों ने गोल्ड, सिल्वर व रजत पदक जीत कर देश में प्रदेश व जिले का नाम रोशन करने का काम किया है। कुश्ती के क्षेत्र में नरेंद्र की उपलब्धियों को देखते हुए सरकार द्वारा वर्ष 2000  में नरेंद्र को भीम अवार्ड से नवाजा जा चुका है।  
  अपने अखाड़े में खिलाडिय़ों को प्रशिक्षण देते पहलवान नरेंद्र।

पूर्वजों से विरासत में मिले कुश्ती के गुर

गांव पड़ाना निवासी नरेंद्र पहलवान ने बताया कि उसे कुश्ती के गुर अपने पूर्वजों से विरासत में मिले हैं। उसके पिता मीर सिंह तथा चाचा दिलबाग सिंह भी कुश्ती के अच्छे पहलवान थे। नरेंद्र ने अपने चाचा दिलबाग से कुश्ती का प्रशिक्षण प्राप्त कर राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना परचम लहराया। नरेंद्र ने 1984 में पहली बार जिला स्तरीय चैंपियनशिप में प्रतिभागिता की थी और इस प्रतियोगिता में नरेंद्र ने गोल्ड मैडल हासिल किया था। इसके बाद नरेंद्र ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। कुश्ती के क्षेत्र में नरेंद्र के उत्कृष्ट प्रदर्शन को देखते हुए रेलवे ने 1992  में नरेंद्र को चीफ टिकट इंस्पेक्टर (सीटीआई) के पद पर नौकरी दे दी।
अपने अखाड़े में खिलाडिय़ों को प्रशिक्षण देते पहलवान नरेंद्र।

खेल में राजनीति के कारण ओलंपिक में नहीं ले पाया हिस्सा

पहलवान नरेंद्र ने बताया कि खेलों में आज भी राजनीति होती है और पहले भी राजनीति होती थी। कोच अपने चहेतों को आगे बढ़ाने के लिए अच्छे खिलाडिय़ों को नजरअंदाज कर देते हैं। नरेंद्र ने बताया कि अब खेलों में वीडियोग्राफी शुरू होने से पारदर्शिता को बढ़ावा मिला है। जबकि पहले वीडियोग्राफी नहीं होती थी। इसलिए कोच पहले अपनी मनमर्जी चलाते थे। वह खुद भी कई बार कोच की मनमर्जी का शिकार हुए हैं। कोच की राजनीति के चलते ही वह ओलंपिक में भाग नहीं ले पाए। नरेंद्र ने बताया कि खेल में राजनीति के चलते ही उसे इंटरनेशनल कुश्ती में जबरदस्ती हरवा दिया गया था। नरेंद्र ने बताया कि ओलंपिक में देश को गोल्ड दिलवाने के अपने सपने को साकार करने के लिए ही उसने अपना अखाड़ा शुरू किया है। इसलिए वह अखाड़े में खिलाडिय़ों को निशुल्क प्रशिक्षण दे रहे हैं।

यह हैं पहलवन नरेंद्र की उपलब्धियां

1981  में दिल्ली में आयोजित कैडेट चैंपियनशिप में गोल्ड
1992  में कोलंबिया में आयोजित जूनियर वल्र्ड चैंपियनशिप में ब्रांज मैडल
1992  में नेशनल चैंपियनशिप में सिल्वर मैडल
1993  में नेशनल चैंपियनशिप में प्रतिभागिता की
1994  नेशनल चैंपियनशिप में ब्रांज मैडल
1994  में नेशनल गेम्ज में गोल्ड मैडल
1994  में चाइना में आयोजित एशिया चैंपियनशिप में ब्रांज
1995  में दिल्ली में आयोजित नेशनल चैंपियनशिप में गोल्ड मैडल
1995  में आस्ट्रेलिया में आयोजित कॉमनवेल्थ में गोल्ड
1996  में नेशनल चैंपियनशिप में गोलड मैडल
1998  में नेशनल चैंपियनशिप में ब्रांज

गांव की पहली एमबीबीएस डॉक्टर बन सपना ने पेश की महिला सशक्तिकरण की मिशाल

गांव का गौरव

--बीडीएस में दाखिला होने के बाद भी कम नहीं हुई एमबीबीएस बनने की चाह, दोबारा से दी परीक्षा और एमबीबीएस के लिए हो गया चयन 

--ग्रामीण परिवेश में रहकर परिस्थितियों का डटकर किया मुकाबला

--सुविधाओं के अभाव को भी नहीं बनने दिया रास्ते का रोड़ा 

नरेंद्र कुंडू
जींद।
जिले के पिल्लूखेड़ा खंड के छोटे से गांव भूराण निवासी सपना ने एमबीबीएस के लिए अपना चयन करवाकर समाज के सामने यह साबित कर दिखाया है कि आज लड़कियां किसी भी क्षेत्र में लड़कों से पीछे नहीं हैं। लगभग तीन हजार की आबादी वाले इस गांव से एमबीबीएस डॉक्टर बनने वाली सपना गांव की पहली लड़की है। सपना का सपना था एमबीबीएस डॉक्टर बनने का लेकिन जब एमबीबीएस के लिए उसका चयन नहीं हुआ तो उसने बीडीएस में दाखिला ले लिया। बीडीएस में दाखिला लेने के बाद भी सपना की एमबीबीएस बनने की चाह कम नहीं हुई। सपना ने दोबारा मेहनत की और एमबीबीएस में दाखिला लेकर यह साबित कर दिया कि यदि इंसान कुछ हासिल करने की ठान ले और सच्ची लग्न से मेहनत करे तो दुनिया की कोई भी ताकत उसको उसकी मंजिल प्राप्त करने से नहीं रोक सकती। एमबीबीएस डॉक्टर बनकर धन कमाना सपना का लक्ष्य नहीं है। बल्कि सपना डॉक्टर बनकर समाज की सेवा करना चाहती है। इस समय सपना अग्रोहा के मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही और यह उसकी पढ़ाई का तीसरा वर्ष चल रहा है।
सपना ने अपनी दसवीं कक्षा तक की पढ़ाई गांव के ही एक निजी स्कूल से और मैडिकल संकाय की 12वीं कक्षा की पढ़ाई कन्या गुरुकुल सीनियर सैकेंडरी स्कूल खानपूर कलां से पास की और १२वीं के परीक्षा परिणाम में सपना ने 96.2 प्रतिशत अंक लेकर पूरे गुरूकुल में टॉप किया था। ग्रामीण परिवेश से संबंध रखने वाली सपना ने मैडिकल संकाय में पूरे गुरुकुल में टॉप कर यह साबित कर दिया है कि ग्रामीण क्षेत्र में भी प्रतिभा की कमी नहीं है। सपना ने दिन-रात कड़ी मेहनत कर यह उपलब्धि प्राप्त की है। सपना पिछली कक्षाओं में भी टॉपर रही है। सपना 12वीं कक्षा तथा 10वीं कक्षा में भी 96.2 प्रतिशत अंक हासिल कर क्षेत्र में अपनी सफलता के झंडे गाड़ चुकी है।

ताऊ से मिली प्रेरणा

साधारण परिवार व ग्रामीण परिवेश से संबंध रखने वाली सपना प्रतिभा की धनी है। सपना को डॉक्टर बनने की प्रेरणा अपने ताऊ प्रेम सिंह कुंडू से मिली। प्रेम ङ्क्षसह कुंडू स्वास्थ्य विभाग से हेल्थ निरीक्षक के पद से सेवानिवृत्ति हो चुके हैं। प्रेम सिंह ने एक अच्छे मार्गदर्शक की तरह पथ-पथ पर सपना का मार्ग दर्शन करते हुए उसे निरंतर कड़ी मेहनत करते हुए आगे बढऩे के लिए प्रेरित भी किया। अपने ताऊ से प्रेरणा लेकर सपना लगातार अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ती चली गई। एकलव्य की तरह सपना ने अपना पूरा ध्यान अपने लक्ष्य पर केंद्रीत कर कठोर परिश्रम किया। अपनी मेहनत के बूते ही आज सपना अपने लक्ष्य के बिल्कुल करीब पहुंच चुकी है। एमबीबीएस की पढ़ाई का उसका यह तीसरा वर्ष चल रहा है और आगामी दो वर्षों के बाद सपना के हाथ में एमबीबीएस की डिग्री होगी।

कभी नहीं लिया एक्सट्रा कक्षा का सहारा 

सपना की एक खास बात यह भी है कि सपना ने अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए कभी किसी एक्सट्रा कक्षा या ट्यूशन का सहारा नहीं लिया। सपना ने अपनी सफलता का श्रेय अपने अध्यापकों व अपने परिवार के सदस्यों को देते हुए बतया कि उसने कभी भी अतिरिक्त कक्षाओं का सहारा नहीं लिया। सपना ने बताया कि मैडिकल संकाय में सफलता प्राप्त करने के लिए अधिकतर बच्चे ट्यूशन या एक्सट्रा कक्षाएं लगाते हैं, तब जाकर कहीं उन्हें सफलता हासिल होती है। लेकिन उसने अपनी १२वीं कक्षा तक की पढ़ाई के दौरान कभी भी ट्यूशन या एक्सट्रा कक्षा का सहारा नहीं लिया, बल्कि उसने दिन-रात कड़ी मेहनत कर यह मुकाम हासिल किया है।

डटकर किया परिस्थितियों का सामना

सपना ग्रामीण परिवेश के एक साधारण परिवार से संबंध रखती है। सपना की मां गृहणी है और पिता पानीपत में एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते हैं। ग्रामीण परिवेश में होने के कारण सपना को पढ़ाई के लिए सही माहोल व उपयुक्त सुविधाएं नहीं मिल सकी लेकिन सपना ने कभी भी न तो माहोल की परवा की और न ही सुविधाओं के अभाव को पढ़ाई पर हावी होने दिया। सपना ने परिस्थितियों का डटकर सामना किया और लगातार कठोर परिश्रम करते हुए पढ़ाई के क्षेत्र में अपना परचम लहराया। 

Thursday, 15 December 2016

मजदूरी कर बेटे को करवाई मुम्बई आईआईटी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई

तीन हजार की आबादी वाले भूराण गांव से आईआईटी से इंजीनियरिंग करने वाला गांव का पहला छात्र बनेगा रामफल का लड़का नवीन

परिवार की कमजोर परिस्थितियों के बावजूद भी रामफल अपने बेटे को आईआईटी मुंबई से करवा रहा है कैमिकल इंजीनियर की पढ़ाई

बेटों के साथ-साथ बेटियों को भी दिलवा रहा है उच्च शिक्षा 

रामफल अपनी पत्नी सुनीता के साथ।
नरेंद्र कुंडू
जींद।
जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर की दूरी पर जींद-पानीपत मार्ग पर स्थित भूराण गांव वैसे तो अपनी एक अलग पहचान रखता है लेकिन गांव का ही एक 49 वर्षीय रामफल नामक व्यक्ति इस गांव का गौरव है। रामफल समाज के सामने एक अच्छे पिता की मिशाल पेश कर रहा है। रामफल अपनी आर्थिक परिस्थितियों की परवाह किए बिना अपने चारों बच्चों को उच्च शिक्षा दिलवाकर समाज को एक सुशिक्षित नागरिक देने का काम किया है। इतना ही नहीं रामफल ने अपने बेटे व बेटियों में भी किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं किया। वह अपनी बेटियों को भी बेटों की तरह अच्छी शिक्षा दिलवा रहा है। आज जहां रामफल की दोनों बेटियां जीएनएम व बीएससी नर्सिंग की पढ़ाई कर रही हैं, तो वहीं रामफल का एक लड़का मुंबई आईआईटी से कैमिकल इंजीनियर की पढ़ाई कर रहा है और दूसरा बेटा गांव के ही एक निजी स्कूल से 12वीं कक्षा की पढ़ाई कर रहा है। इस प्रकार प्रतिदिन महज 250 से 300 रुपये की मजदूरी करने वाला रामफल नाम का यह सख्श हर वर्ष अपने बच्चों की पढ़ाई पर लाखों रुपये खर्च करता है। जबकि रामफल की आर्थिक परिस्थितियां इस बात की इजाजत नहीं देती कि वह अपने बच्चों के लिए इस तरह अच्छी शिक्षा की व्यवस्था कर सके। हर वर्ष ढाई से तीन लाख रुपये तो मुंबई आईआईटी से कैमिकल इंजीनियर की पढ़ाई करने वाले रामफल के बेटे नवीन की पढ़ाई पर खर्च हो रहे हैं। रामफल ने अपने बच्चों को एक कामयाब इंसान बनाने के लिए दिन-रात कड़ी मेहनत की है। जिस तरह से रामफल अपनी परिस्थितियों से जूझ कर अपने बच्चों की हर जरूरत को पूरा कर एक अच्छे पिता का अपना फर्ज अदा कर रहा है तो ठीक उसी प्रकार से पढ़ाई में अव्वल दर्जा हासिल कर उसके बच्चे भी अपने माता-पिता की उम्मीदों पर खरे उतर रहे हैं। रामफल का बड़ा बेटा नवीन दिन-रात कड़ी मेहनत कर अपने माता-पिता के सपने को साकार करने का प्रयास कर रहा है। कैमिकल इंजीनियरिंग में नवीन का यह तीसरा वर्ष चल रहा है और एक वर्ष के बाद यह अपनी इंजीनयरिंग की पढ़ाई पूरी कर तीन हजार की आबादी वाले इस गांव मेें मुंबई जैसे आईआईटी कॉलेज से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाला गांव का पहला छात्र होगा। परिवार की कमजोर परिस्थितियों के बावजूद भी रामफल ने अपने बेटे नवीन को दसवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद 12वीं की पढ़ाई के लिए राजस्थान के कोटा शहर में भेजा। नवीन ने भी बिना समय गंवाए १२वीं की पढ़ाई के साथ-साथ आईआईटी में दाखिले के लिए कोचिंग भी ली। 12वीं की परीक्षा उतीर्ण करने के बाद नवीन ने आईआईटी की प्रवेश परीक्षा पास की और परीक्षा में अच्छी रैंकिंग हासिल करने के कारण नवीन का दाखिला आईआईटी मुंबई में हुआ। अपने पिता रामफल के साथ-साथ नवीन भी अपने गांव, जिले या प्रदेश ही नहीं बल्कि देश के युवाओं के लिए एक मिशाल है, जिसने परिवार की कमजोर परिस्थितियों के बावजूद भी इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल की है। नवीन अपनी मेहनत के बूते पर अपने नाम के शब्द को बिल्कुल सार्थक सिद्ध कर रहा है। वहीं रामफल की बड़ी लड़की ममता जीएनएम का कोर्स कर रही है और पूजा बीएससी नर्सिंग की पढ़ाई कर रही है। रामफल का सबसे छोटा लड़का आशीष जो अभी गांव के ही एक निजी स्कूल से 12वीं की पढ़ाई कर रहा है। रामफल की पत्नी सुनीता महज पांचवीं पास है और वह भी बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलवाकर एक अच्छे समाज के निर्माण करने के अपने पति रामफल के प्रयास में सहयोग कर रही है। 



Saturday, 26 November 2016

घर की चारदीवारी में भी महफूज नहीं हैं बच्चे

बच्चों के शोषण व हिंसात्मक मामलों में हो रही बढ़ौतरी
घर के अंदर हो रहे शोषण व प्रताडऩा से छुटकारा पाने के लिए चाइल्ड हैल्प लाइन का सहारा ले रहे बच्चे
बाल मजदूरी के मामलों पर भी नहीं लग पा रही रोक
एक वर्ष में चाइल्ड हैल्प लाइन के पास आए हिंसा व छेड़छाड़ के 66 मामले

नरेंद्र कुंडू
जींद। भौतिकतावादी इस युग में हमारा सामाजिक ताना-बाना टूटने के साथ-साथ हमारे नैतिक मूल्यों में भी इतनी गिरावट आ चुकी है कि आज घर की चारदीवारी में भी हमारे बच्चे महफूज नहीं हैं। घर के अंदर ही परिवार के सदस्यों द्वारा बच्चों का शोषण करने के साथ-साथ बच्चों को प्रताडि़त भी किया जा रहा है। घर के अंदर बच्चों पर बढ़ते शोषण व हिंसात्मक मामलों का सबूत दे रही है चाइल्ड हैल्प लाइन। घर की चारदीवारी के अंदर हो रहे शोषण व प्रताडऩा से मुक्ति पाने के लिए बच्चे चाइल हैल्प लाइन का सहारा ले रहे हैं। चाइल्ड हैल्प लाइन के आंकड़ों पर यदि नजर डाल जाए तो सबसे अधिक मामले बच्चों के साथ हो रहे शोषण व प्रताडऩा के सामने आ रहे हैं। पिछले एक वर्ष में चाइल्ड हैल्प लाइन के पास छेड़छाड़ व हिंसा के 66 तथा बाल मजदूरी के 31 मामले सामने आए हैं। वहीं बाल मजदूरी पर भी प्र्रशासन अंकुश नहीं लगा पा रहा है।  
 चाइल्ड हैल्प लाइन पर बच्चों की शिकायत दर्ज करते अधिकारी।
आज आधुनिकता की चकाचौंध व भागदौड़ भरी इस जिंदगी में अधिक रुपये की चाह में अभिभावक अपने बच्चों से दूर होते जा रहे हैं। समय के अभाव होने का बहाना लेकर अभिभावक अपने बच्चों  के लिए भी वक्त नहीं निकाल पा रहे हैं। ऐसे में अभिभावक अपनी इस जिम्मेदारी से बचने के लिए अपने बच्चों की देखरेख की का जिम्मा परिवार के ही दूसरे सदस्यों या अपने सगे संबंधियों को सौंप देते हैं। बच्चों की देखरेख की जिम्मेदारी परिवार के सदस्यों व सगे संबंधियों को देते समय अभिभावक इस बात की तरफ भी ध्यान नहीं देते कि जिसे वह अपने बच्चों की देखरेख की जिम्मेदारी सौंप रहे हैं, वह किस परिवर्ती का व्यक्ति है। अभिभावकों की यही अनदेखी उनके बच्चों के लिए बड़ी मुसीबत बन जाती है। अभिभावकों की इसी लापरवाही का फायदा उठाकर बच्चों के रक्षक ही उनके भक्षक बन रहे हैं। घर की चारदीवारी के अंदर ही बच्चों के सगे संबंधी बच्चों का शोषण करने के साथ-साथ उन्हें प्रताडि़त भी कर रहे हैं लेकिन बच्चे अब इस शोषण से मुक्ति पाने के लिए चाइल्ड हैल्प लाइन 1098  का सहारा ले रहे हैं। 

चाइल्ड हैल्प लाइन के पास आई शिकायतों में शोषण व हिंसात्मक के मामले ज्यादा

चाइल्ड हैल्प लाइन के पास आ रही शिकायतों में सबसे ज्यादा मामले बच्चों पर घर के अंदर हो रही छेड़छाड़ व प्रताडऩा के हैं। अगस्त 2015  से नवंबर 2016 तक बच्चों के साथ छेड़छाड़ या प्रताडऩा के 66  मामले सामने आ चुके हैं। वहीं बाल मजदूरी के 31 मामले सामने आए हैं। वहीं गुमशुदगी के 83  तो बाल विवाह के अभी तक सात मामले ही चाइल्ड हैल्प लाइन के पास आए हैं। पिछले एक वर्ष में चाइल्ड हैल्प लाइन के पास भिन्न-भिन्न मामलों में कुल 387 शिकायतें आ चुकी हैं। 

शिकायत मिलने के तुरंत बाद बच्चों की मदद की जाती है

चाइल्ड हैल्प लाइन के पास आ रही शिकायतों में सबसे ज्यादा शिकायतें घर के अंदर बच्चों के साथ हो रहे शोषण व प्रताडऩा के हैं। इसके साथ ही बाल मजदूरी के मामले भी काफी सामने आ रहे हैं। चाइल्ड हैल्प लाइन द्वारा शिकायत मिलने के तुरंत बाद बच्चों की मदद की जाती है। गुमशुदा, छेड़छाड़, प्रताडऩा, बाल मजदूरी, बाल विवाह, बच्चों की देखरेख, अध्यापक या रिश्तेदार द्वारा प्रताडि़त किए जाने, बच्चों के लालन-पालन, बच्चों के दाखिले से संबंधित मामलों में बच्चे चाइल्ड हैल्प लाइन की मदद ले सकते हैं। 
विनोद कुमार, सैंटर कोर्डिनेटर
चाइल्ड हैल्प लाइन, जींद

समाज में बढ़ा है अविश्वास

आज हमारे अंदर संस्कारों की काफी कमी हो गई है। मनुष्य स्वार्थी व संवेदनहीन हो गया है। आज मनुष्य अतृप्त व दुखी है। इसलिए वह अपने छोटे से स्वार्थ के लिए भी अपने नाजूक रिश्तों को दांव पर लगा देता है। इससे समाज में अविश्वास की भावना बढ़ी है और गलत बातें ज्यादा निकल कर सामने आ रही हैं। वहीं अभिभावक भी बच्चों को दिल से छूने की अपेक्षा केवल शारीरिक रूप से बच्चे पर अपना हक जताने का दिखावा करते रहते हैं। इससे अभिभावक व बच्चों के बीच प्रेभावना कम हुई है। अभिभावकों को भी चाहिए कि वह अपने बच्चे के दोस्तों को भी अपने बच्चे की तरह समझें। 
नरेश जागलान, मनोवैज्ञानिक

Saturday, 15 October 2016

कहाँ खो गई हमारी बेटियां

जिले के 29 गांवों में बेटियों को अब भी समझा जाता है बोझ
जिले का लिंगानुपात सुधरकर 888 पर पहुंचा
अब लिंगानुपात में पिछड़े गांवों पर फोकस करेगा स्वास्थ्य विभाग
पिछले वर्षों के मुकाबले जिले में बढ़ा है लिंगानुपात

नरेंद्र कुंडू
जींद। एक ओर जहां सरकार बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान चला रही है, वहीं जिला में अब भी लोगों की सोच बेटियों के प्रति पूरी तरह नहीं बदली है। जिले में 29 गांव ऐसे हैं, जिन गांवों में बेटियों को अब भी बोझ समझा जाता है। यह इसी का परिणाम है कि इन 29 गांवों में इस समय भी लिंगानुपात 550 से नीचे है। हालांकि स्वास्थ्य विभाग द्वारा जिले में चलाए गए बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ के काफी सकारात्मक परिणा

म सामने आए हैं। इसके चलते पिछले वर्षों की तुलना में इस वर्ष जिले का लिंगानुपात में काफी सुधार हुआ है। इस वर्ष जिले का लिंगानुपात 857 से बढ़कर 888 पर पहुंच गया है। गिरते लिंगानुपात को रोकने के लिए स्वास्थ्य विभाग की टीम द्वारा सख्त रुख अपनाया गया है। इसी के चलते स्वास्थ्य विभाग की टीम द्वारा जिले ही नहीं बल्कि जिले से बाहर भी 33 ऐसे अल्ट्रासाउंड केंद्रों पर छापेमारी की जा चुकी है, जिन अल्ट्रासाउंड केंद्रों पर विभाग को लिंग जांच करने जैसी संदिग्ध गतिविधियों की भनक लगी। 

आधे से ज्यादा गांवों में ही सुधरा लिंगानुपात


जिले में गिरते लिंगानुपात को रोकने के लिए स्वास्थ्य विभाग द्वारा शुरू किए गए अभियान के तहत स्वास्थ्य विभाग द्वारा 39 ऐसे गांवों को चिन्हित किया गया था जिनका लिंगानुपात 555 से कम था। इनमें से 28 गांवों के लिंगानुपात में काफी सुधार है। शेष बचे 11 गांवों में मुहिम का असर खास नहीं रह पाया। इन 11 गांवों के अलावा 18 और गांव ऐसे हैं, जहां बेटियों को बोझ समझा जाता है।  इन 39 गांवों में से अब 11 गांव ही ऐसे बचे हैं जिनका लिंगानुपात 550से कम है। बाकि 28 गांवों के लिंगानुपात में सुधार हुआ है और इन गांवों का लिंगानुपात 550 से ऊपर पहुंच गया है। 

स्वास्थ्य विभाग द्वारा 33 बार की जा चुकी हैं छापेमारी

कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए स्वास्थ्य विभाग द्वारा अल्ट्रासाउंड केंद्रों पर कड़ी नजर रखी जा रही है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा पिछले वर्ष 33 अल्ट्रासाउंड केंद्रों पर छापेमारी की गई। इनमें 18 बार छापेमारी जींद जिले में, 13 बार दूसरे जिलों में तथा तीन बार प्रदेश के साथ लगते उत्तरप्रदेश व हिमाचल में छापेमारी की गई हैं। 

इस वर्ष इन-इन गांवों का लिंगानुपात 550 से नीचे

गांव का नाम लिंगानुपात 
सेढ़ा माजर 181
रजाना खुर्द 200
खतला 285
कटवाल 285
फैरण खुर्द 333
रोजखेड़ा 333
रजाना कलां 354
जलालपुर खुर्द 363
हसनपुर 363
ऐंचरा कलां 375
श्रीरागखेड़ा 375
जीवनपुर 384
मांडोखेड़ी 428
मंगलपुर 431
डुमरखां खुर्द 433
ढाणी रामगढ़ 470
दुड़ाना 500
किलाजफरगढ़ 509
खेड़ी मसानियां 520
नगूरां         520
खोखरी 521
चंदनपुर 521
कलोदा खुर्द 533
खेड़ी जाजवान 538
जैजवंती 538
देशखेड़ा 545
वर्ष के अनुसार जिले का लिंगानुपात का आंकड़ा
वर्ष लिंगानुपात
2005 860
2006 890
2007 896
2008 894
2009 847
2010 869
2011       837
2012 833
2013 831
2014 863
2015 857
जनवरी से सितंबर 2016 तक 888

उठाए जा रहे हैं कठोर कदम

 जिले में कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए स्वास्थ्य विभाग द्वारा कठोर कदम उठाए जा रहे हैं। प्रत्येक  गांव में गर्भवती महिलाओं का रजिस्ट्रेशन किया जाता है, ताकि विभाग इन महिलाओं पर नजर रख सके। समय-समय पर अल्ट्रासाउंड केंद्रों पर छापेमारी की जाती है। गांवों में एएनएम, आंगनवाड़ी वर्कर, आशा वर्कर, पंचों, सरपंचों व सामाजिक संगठनों के सहयोग से जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। लोगों की मानसिकता बदलने के लिए जिले की तीन नेशनल खिलाडिय़ों को रोल मॉडल बनाया गया है, वहीं जानकी फिल्म के माध्यम से भी लोगों को जागरूक किया जाता है। पिछले वर्षों की तुलना में जिले के लिंगानुपात में काफी सुधार हुआ है। जिन गांवों का लिंगानुपात कम है, उन गांवों पर विभाग का विशेष फोकस रहेगा।  
डॉ. प्रभूदयाल, डिप्टी सिविल सर्जन
नागरिक अस्पताल, जींद

आशा वर्कर रख रहीं हैं नजर 

गांव में आंगनबाड़ी वर्कर व आशा वर्कर नियमित रूप से गर्भवती महिलाओं के संपर्क में रहती हैं। गांव में भ्रूण हत्या की कोई बात नहीं है। यदि लिंगानुपात कम है तो यह कुदरत की ही देन है। गांव व पंचायत इस विषय में बहुत गंभीर है।

कृष्ण कुमार सरपंच रजाना खुर्द।






Thursday, 13 October 2016

हॉपर नामक कीट व तना गलन की बीमारी ने दी फसल में दस्तक

हॉपर व तना गलन को रोकने में पेस्टीसाइड भी नहीं है कारगर
चार किस्म के हैं हॉपर नामक कीट
समझदारी की फसल के बचाव का एकमात्र तरीका  

नरेंद्र कुंडू
जींद। खेतों में किसान का पीला सोना (धान) लगभग पक्ककर तैयार है लेकिन धान की इस अंतिम चरण की प्रक्रिया में पहुंचने के साथ धान में हॉपर नामक कीट व तना गलन की बीमारी का प्रकोप बढ़ गया है। धान की फसल में हॉपर से ज्यादा नुकसान तना गलन का है। क्योंकि हॉपर कीट तो खेत में खड़ी फसल के कुछ ही को नुकसान पहुंचाता है लेकिन तना गलन नामक बीमारी के ज्यादा क्षेत्र में फैलने की संभावनाएं हैं। इसमें सबसे खास बात यह है कि हॉपर व तना गलन से फसल को बचाव के लिए पेस्टीसाइड भी कारगर साबित नहीं हो रहे हैं। इसलिए किसानों को इस तरफ विशेष ध्यान देने की जरूरत है। पेस्टीसाइड पर अपना खर्च करने की बजाए सावधानी के साथ अपनी फसल की तरफ ध्यान देने की जरूरत है।

चार किस्म का है रस चुसक हॉपर कीट 

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार हॉपर एक रस चुसक कीट है और इसकी चार किस्में अभी तक देखी जा चुकी हैं। हॉपर कीट सफेद, हरा, ब्राउन व काले रंग का होता है। ब्राउन व काला हॉपर पौधे के तने का रस चूसता है, वहीं सफेद व हरा हॉपर पौधे के पत्तों का रस चूसता है। पत्ते व तने का रस चूसने के कारण यह काले पड़ जाते हैं। तने व पत्ते का रस चूस लिए जाने के कारण यह काला पडऩे के बाद सुख कर गिर जाता है।

हॉपर के प्रकोप से खेत में इस तरह के दिखाई देंगे लक्षण

जिस खेत में हॉपर का प्रकोप होगा, उस खेत में किसी-किसी स्थान पर गोलाकार, त्रिभुजाकार या अंडाकार के आकार में फसल खराब हुई दिखाई देगी। खेत में जिस क्षेत्र में छाया होगी, वहां से इसकी शुरूआत होगी।

क्या है तना गलन बीमारी

तना गलन बीमारी उन क्षेत्र में आती है, जहां पर जमीन में नमक की मात्रा ज्यादा होती है या पानी हल्का होता है। इसलिए पौधे को जमीन से पर्याप्त मात्रा में फासफोर्स नहीं मिल पाता। यह बीमारी फसल की रोपाई के शुरूआत में व पकाई के समय में आती है। इस बीमारी के आने पर पौधे का तना नीचे से काला पड़ जाता है। पौधे में जाइलम व फ्लोयम नाम की दो नलियां होती हैं। जाइलम नाम की नाली जमीन से पौधे के लिए पानी व खुराक पहुंचाती है। वहीं फ्लोयम नाम की नाली पौधे की पत्तियों में तैयार होने वाले भोजन को पौधे के प्रत्येक हिस्से तक पहुंचाती है लेकिन तने के गलने के कारण यह दोनों नालियां खत्म हो जाती हैं। इससे पौधे तक खुराक व भोजन नहीं पहुंचने के कारण पौधा काला होकर गिर जाता है। ऐसे में पेस्टीसाइड का प्रयोग करना फिजूलखर्ची है।

तना गलन में क्या करें किसान

तना गलन बीमारी उस समय फसल में आती है, जब फसल पकने में एक सप्ताह तक का समय बाकि रहता है। ऐसे में किसानों को चाहिए कि फसल का पानी सुखा दें और फसल की कटाई कर गिरी में (एक जगह) लगा दें। ऐसा करने से फसल का जो दाना कच्चा है, वह भी पक्क कर तैयार हो जाएगा। हॉपर कीट व तना गलन की बीमारी का कोई उपचार नहीं है। इसलिए किसानों को चाहिए कि वह पेस्टीसाइड पर फिजुलखर्ची नहीं करें। हॉपर कीट से बचाव के लिए किसान प्रति एकड़ में 300 ग्राम डीडीवीपी को दस किलो रेत में मिलाकर छिड़काव कर सकते हैं।  इसके अलावा कोई उपचार नहीं हैं। बाकि हॉपर से किसानों को भयभीत होने की जरूरत नहीं है। यह पूरे खेत में नुकसान की बजाए कुछ ही क्षेत्र में नुकसान करता है। वहीं तना गलन बीमारी आने पर किसान फसल को पकाई से दो-तीन पहले काटकर धान को गिरी में लगा सकते हैं।
डॉ. कमल सैनी, कृषि विकास अधिकारी
कृषि विभाग, जींद