Thursday, 28 December 2017

कलेंडर बदलिए अपनी संस्कृति नहीं

नरेंद्र कुंडू 
जनवरी आने से पहले ही सब नववर्ष की बधाई देने लगते हैं। मानो कितना बड़ा पर्व हो। नया केवल एक दिन ही नहीं कुछ दिन तो नई अनुभूति होनी ही चाहिए। आखिर हमारा देश त्यौहारों का देश है। ईस्वी-संवत् का नया साल एक जनवरी को और भारतीय नववर्ष (विक्रमी संवत्) चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाता है। आइये देखते हैं दोनों का तुलनात्मक अंतर।
1- प्रकृति: एक जनवरी को कोई अंतर नहीं जैसा दिसंबर वैसी जनवरी। वहीं चैत्र मास में चारों तरफ फूल खिल  जाते हैं, पेड़ाें पर नए पत्ते आ जाते हैं। चारों तरफ हरियाली मानो प्रकृति नया साल मना रही हो।
2- मौसम, वस्त्र: दिसंबर व जनवरी में वही वस्त्र, कंबल, रजाई, ठिठुरते हाथ पैर लेकिन चैत्र मास में सर्दी जा रही होती है, गर्मी का आगमन होने जा रहा होता है।
3- विद्यालयों का नया सत्र: दिसंबर-जनवरी में वही कक्षा, कुछ नया नहीं। जबकि मार्च-अप्रैल में स्कूलाें का परिणाम आता है। नई कक्षा, नया सत्र यानि विद्यालयों में नया साल।
4- नया वित्तीय वर्ष: दिसंबर- जनवरी में कोई खातों की क्लोजिंग नहीं होती। जबकि 31 मार्च को बैंकों की क्लोजिंग होती है। नए बही खाते खोले जाते हैं। सरकार का भी नया सत्र शुरू होता है।
5- कलैंडर: जनवरी में नया कलैंडर आता है। चैत्र में नया पंचांग आता है। उसी से सभी भारतीय पर्व, विवाह और अन्य महूर्त देखे जाते हैं। इसके बिना हिंदू समाज जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता।
6- किसानों का नया साल: दिसंबर-जनवरी में खेतों में वही फसल होती है। जबकि मार्च-अप्रैल में फसल कटती है। नया अनाज घर में आता है तो किसानों का नया वर्ष और उत्साह होता है।
7- पर्व मनाने की विधि: 31 दिसंबर की रात नए साल के स्वागत के लिए लोग जमकर शराब पीते हैं, हंगामा करते हैं, रात को पी कर गाड़ी चलने से दुर्घटना की सम्भावना, रेप जैसी वारदात, पुलिस प्रशासन बेहाल और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का विनाश। जबकि भारतीय नववर्ष व्रत से शुरू होता है। पहला नवरात्र होता है घर-घर में माता रानी की पूजा होती है। शुद्ध सात्विक वातावरण बनता है।
8- ऐतिहासिक महत्व: एक जनवरी का कोई ऐतिहासिक महत्व नहीं है। जबकि चैत्र प्रतिपदा के दिन महाराज विक्रमादित्य द्वारा विक्रमी संवत् की शुरुआत, भगवान झूलेलाल का जन्म, नवरात्रे प्रारम्भ, ब्रह्मा जी द्वारा सृष्टि की रचना इत्यादि का सम्बंध इस दिन से है। एक जनवरी को अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख और अंग्रेज मानसिकता के लोगों के अलावा कुछ नहीं बदला। अपना नव संवत् ही नया साल है। जब ब्रह्माण्ड से लेकर सूर्य-चांद की दिशा, मौसम, फसल, कक्षा, नक्षत्र, पौधों की नई पत्तियां, किसान की नई फसल, विद्यार्थियों की नई कक्षा, मनुष्य में नया रत्तफ़ संचरण आदि परिवर्तन होते हैं। जो विज्ञान आधारित हैं। इसलिए अपनी मानसिकता को बदलें। विज्ञान   आधारित भारतीय काल गणना को पहचानें। स्वयं सोचें की क्यों मनाये हम एक जनवरी को नया वर्ष?

‘प्राचीन भारत का विज्ञान’

नरेंद्र कुंडू 
आज पश्चिम जगत तरह-तरह से दंभ भरता है और नए-नए आविष्कारों को लेकर हर समय अपनी पीठ थपथपाता रहता है। आज पश्चिम को यह गर्व है कि लगभग सभी बड़े आविष्कार उन्हीं ने किये और कहीं ना कहीं बाकी दुनिया को वह हेय दृष्टि से देखते हैं। लेकिन क्या जिन आविष्कारों पर पश्चिमी देश और वैज्ञानिक अपना दावा ठोकते हैं, क्या उन पर वाकई उनका आधिपत्य माना जाना चाहिए? अगर हमारे देश का इतिहास और पौराणिक कथाएं देखें तो उनमें ऐसे बहुत से आविष्कार, यान, सूत्र, सारणी आदि का प्रयोग और उनका ज्ञान दिया गया है, जिसे सुन और पढ़कर आधुनिक विज्ञान भी दांतों तले उंगलियां दबा लेता है। पौराणिक कथाओं में वर्णित ऋषि-मुनि विज्ञान की खोज  पहले उन चमत्कारों को दर्शा चुके थे, जिन्हें विज्ञान अपना आविष्कार मानता है। फर्क बस इतना है कि पहले इन्हें चमत्कारों की श्रेणी में रखा जाता था और अब यह वैज्ञानिक करामात बन गए हैं। वैदिक काल के लोग खगोल विज्ञान का अच्छा ज्ञान रखते थे। वैदिक भारतीयों को 27 नक्षत्रें का ज्ञान था। वे वर्ष, महीनों और दिनों के रूप में समय के विभाजन से परिचित थे। वे अपने यज्ञ तथा अन्य धर्मिक अनुष्ठान ग्रहों की स्थिति के अनुसार शुभ लग्न देखकर किया करते थे। शुभ लग्न जानने के लिए उन्होंने खगोल विज्ञान का विकास किया था। वे सूर्य की उत्तरायण और दक्षिणायन गति से परिचित थे। महाभारत में भी खगोल विज्ञान से सम्बंधित जानकारी मिलती है। महाभारत में चंद्रग्रहण और सूर्यग्रहण की चर्चा है। इस काल के लोगों का ग्रहों के विषय में भी अच्छा ज्ञान था। परन्तु आज भारत की सबसे बड़ी बिड़म्बना यह है कि कुछ कुंठित बुद्धिजीवी इन्हें मात्र कहानी मानते हैं। यह बुद्धिजीवी तो इतने मानसिक रूप से गुलाम बन चुके हैं कि बिना कुछ सोचे-समझे और अध्ययन किये ही इन सबको काल्पनिक करार दे देते हैं। जबकि खुद अब्दुल कलाम ने कई बार कहा है कि उन्हें प्राचीन भारतीय ग्रंथों से मिसाइल बनाने की प्रेरणा मिली थी। अल्बर्ट आइंस्टीन ने भी कई बार प्राचीन भारतीय ग्रंथो की भूरी-भूरी प्रशंसा की है। कुछ समय पूर्व हिस्टरी चैनल ने यह रहस्योघाटन किया था कि हिटलर प्राचीन भारतीय ग्रंथो पर अध्ययन कर ‘‘टाइम मशीन’’ बनाना चाहता था। यह एक अलग बात है कि किन्हीं कारणों से इनका श्रेय पाश्चात्य वैज्ञानिकों को मिला है। जबकि वास्तविकता यह है कि दुनिया को ज्ञान-विज्ञान भारत की ही देन है।  लेकिन चिंता इस बात की है आज हम अपनी विज्ञान आधारित संस्कृति को भूल कर पश्चिमी संस्कृति की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। पश्चिमी नव वर्ष पर तो हम एक माह पहले बधाइयों के संदेश भेजने शुरू कर देते हैं लेकिन अपने भारतीय नव वर्ष को भूल बैठे हैं। आज हमें अपना कैलेंडर बदलने की जरूरत है, संस्कृति बदलने की नहीं।

Tuesday, 5 December 2017

भारत की महान संस्कृति

नरेंद्र कुंडू 
                  किसी भी देश के विकास में उसकी संस्कृति का बहुत योगदान होता है। देश की संस्कृति, उसके मूल्य, लक्ष्य, प्रथाएं उसका प्रतिनिधित्व करते हैं। भारतीय संस्कृति कभी कठोर नहीं रही। इसलिए यह आधुनिक काल में भी गर्व के साथ जिंदा है। ‘अनेकता में एकता’ कोई शब्द नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी चीज है जो भारत जैसे सांस्कृतिक और विरासत में समृद्ध देश पर पूरी तरह लागू होती है। कुछ आदर्श वाक्य या बयान, भारत के उस दर्जे को बयां नहीं कर सकते जो उसने विश्व के नक्शे पर अपनी रंगारंग और अनूठी संस्कृति से पाया है। मौर्य, चोल और मुगल काल और ब्रिटिश साम्राज्य के समय तक भारत हमेशा से अपनी परंपरा और आतिथ्य के लिए मशहूर रहा। रिश्तों में गर्माहट और उत्सवों में जोश के कारण यह देश विश्व में हमेशा अलग ही नजर आया। इस देश की उदारता और जिंदादिली ने बड़ी संख्या में सैलानियों को इस जीवंत संस्कृति की ओर आकर्षित किया, जिसमें धर्मों, त्योहारों, खान-पान, कला, शिल्प, नृत्य, संगीत और कई चीजों का मेल है। ‘देवताओं की इस धरती’ में संस्कृति, रिवाज और परंपरा से लेकर बहुत कुछ खास रहा है। ‘भारतीय जीवनशैली प्राकृतिक और असली जीवनशैली की दृष्टि देती है। भारतीय संस्कृति विशाल है व इसमें हर प्रकार के रंग और जीवंतता है। यह देश कई सदियों से सहिष्णुता, सहयोग व अहिंसा का जीवंत उदाहरण रहा है और आज भी है। इसके विभिन्न रंग इसकी विभिन्न विचारधाराओं में मिलते हैं। भारत का इतिहास भाईचारे व सहयोग के उदाहरणों से भरा पड़ा है। इतिहास में अलग-अलग समय में विदेशी हमलावरों के कई वार झेलने के बाद भी इसकी संस्कृति व एकता कभी नहीं हारी और हमेशा कायम रही। समय के साथ चलते रहना भारतीय संस्कृति की सबसे अनूठी बात है। यहां सड़क किनारे शो से लेकर थियेटर में एक अत्यंत प्रबुद्ध नाटक तक सबकुछ कलात्मक है। भारतीय संस्कृति सम्पूर्ण मानव समुदाय के विकास क्रम की सम्यक चेष्टाओं का भंडार है और इसीलिए इसे किसी सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता। भारतीय संस्कृति की अपनी विशेषताएं हैं, अपना इतिहास है और अपनी गाथा है। साहित्यकार, कलाकार व कलमकाल (पत्रकार) अपनी कला के माधयम से युवा पीढ़ी को भारत की महान संस्कृति के दर्शन करवा कर राष्ट्रहित में अपना योगदान दे सकते हैं।   



Tuesday, 22 August 2017

'कीट ज्ञान की पाठशाला में एक दिन के विद्यार्थी बनेंगे भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी'

जहरमुक्त खेती के मॉडल को देखने के लिए सितंबर में निडाना आएंगे वरिष्ठ नेता जोशीकार्यक्रम में हरियाणा के अलावा पंजाब के किसान भी होंगे शामिल
कार्यक्रम की तैयारियों को लेकर बनाई रणनीति

नरेंद्र कुंडू 
जींद। थाली को जहरमुक्त बनाने के लिए जींद जिले से शुरू हुई कीट ज्ञान की मुहिम को बारिकी से समझने के लिए भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी किसान खेत पाठशाला में एक दिन के विद्यार्थी बनेंगे। मुरली मनोहर जोशी सितंबर माह में जींद जिले के निडाना गांव का दौरा करेंगे। इसको लेकर कीटाचार्य किसानों ने कार्यक्रम की रणनीति पर अमल शुरू कर दिया है। कार्यक्रम की तैयारियों को लेकर सोमवार को शहर की अर्बन एस्टेट कॉलोनी स्थित जाट धर्मशाला में कीटाचार्य किसानों की एक बैठक हुई। इस बैठक में हरियाणा के अलावा पंजाब के किसानों ने भी भाग लिया। बैठक के दौरान रणनीति तैयार की गई कि भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी को बंद कमरे में मुहिम की जानकारी देने की बजाए खेतों में चल रही पाठशाला में ही मांसाहारी व शाकाहारी कीटों की पहचान करवाएंगे। इसके अलावा कीट ज्ञान की मुहिम को दूसरे प्रदेशों के किसानों तक पहुंचाने के लिए भी कीटाचार्य किसानों ने विचार-विमर्श किया।
गौरतलब है कि फसलों में कीटनाशकों के प्रयोग को कम कर खाने की थाली को जहरमुक्त बनाने के लिए जींद जिले के निडाना गांव में वर्ष २००८ में डॉ. सुरेंद्र दलाल ने किसान खेत पाठशाला की शुरूआत की थी। इस पाठशाला में किसानों को फसल में मौजूद मांसाहारी तथाा शाकाहारी कीटों की पहचान करव कर तथा उनके क्रियाकलापों की जानकारी देकर जागरूक किया जा रहा है। ताकि किसान फसल में मौजूद कीटों से भयभीत होकर फसल में किसी प्रकार के कीटनाशक का प्रयोग नहीं करंे। निडाना गांव से शुरू हुई कीट ज्ञान की इस मुहिम से किसानों को काफी सकारात्मक परिणाम मिले हैं। इससे किसानों का कीटनाशकों पर खर्च तो कम हुआ ही है साथ में पैदावार में भी बढ़ौतरी हुई। फसल में कीटनाशकों का प्रयोग नहीं होने से किसानों को जहर से भी मुक्ति मिली। पिछले 9 वर्षों से चल रही यह मुहिम अब हरियाणा के साथ-साथ पंजाब में भी फैल चुकी है। कीट ज्ञान की इस मुहिम को सरकार तक पहुंचाने के लिए गत माह जींद जिले के कीटाचार्य किसान भाजपा किसान मोर्चा के उपाध्यक्ष नरेश सिरोह के नेतृत्व में भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी से उनके आवास पर मिले थे। मुरली मनोहर जोशी ने कीटाचार्य किसानों से सितंबर माह में निडाना में आकर किसान खेत पाठशाला का दौरा करने का आश्वासन दिया था। कीटाचार्य किसानों ने सोमवार को जाट धर्मशाला में बैठकर कर भाजपा नेता के दौरे की तैयारियों को लेकर रणनीति बनाई है। बराह खाप के प्रधान कुलदीप ढांडा तथा कीटाचार्य किसान रणबीर मलिक ने बताया कि मुरली मनोहर जोशी के साथ वह निरंतर संपर्क में हैं और जल्द ही निडाना के उनके दौरे का दिन व समय भी निश्चित हो जाएगा। उन्होंने बताया कि सितंबर में होने वाले इस कार्यक्रम में हरियाणा के साथ-साथ पंजाब के किसान भी इसमें शामिल होंगे। बैठक में सर्वसम्मति से यह फैसला भी किया गया है कि यह कार्यक्रम किसी बंद कमरे में करने की बजाए खेत में चल रही किसान पाठशाला में किया जाएगा। पाठशाला में मुरली मनोहर जोशी को किसानों की कार्य पद्धति से रूबरू करवाया जाएगा। ताकि उनकी मार्फत जल्द से जल्द उनकी मांग सरकार तक पहुंच सके। 

दूसरे प्रदेशों में भी चलेंगी पाठशालाएं

कीटाचार्य रणबीर मलिक तथा सेवानिवृत्त जिला बागवानी अधिकारी डॉ. बलजीत भ्याण ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों से जींद के अलावा हिसार, फतेहाबाद, बरवाला तथा पंजाब के लगभग 10 जिलों में उनकी किसान खेत पाठशालाएं चल रही हैं। उनकी पाठशालाओं से हजारों किसान प्रशिक्षण प्राप्त कर कीटनाशकों का प्रयोग छोड़ चुके हैं। किसान खेत पाठशालाओं की बढ़ती मांग को देखते हुए अलग वर्ष हरियाणा व पंजाब के अलावा आस-पास के दूसरे प्रदेशों में भी किसान खेत पाठशालाएं चलाने की योजना तैयार की गई है। 
 

Saturday, 5 August 2017

शीतकालीन सत्र में संसद में छाएगा निडाना का कीट ज्ञान का मॉडल

भाजपा के वरिष्ठ नेता जोशी हरियाणा के राज्यपाल व सीएम को चिट्टी लिखकर कीट मॉडल को प्रोत्साहित करने की करेंगे सिफारिस
--सितम्बर में कीट ज्ञान के मॉडल को देखने के लिए जींद आएंगे मुरली मनोहर जोशी

नरेंद्र कुंडू 

जींदजिले के निडाना गांव से शुरू हुई कीट ज्ञान की मुहिम आगामी शीतकालीन सत्र में संसद में चर्चा का विषय बनेगी। संसद में निडाना के कीट ज्ञान के मॉडल पर प्रदर्शनी लगाई जाएगी तथा इस दौरान सांसदों को भी कीटों का पाठ पढ़ाया जाएगा। भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने इस मामले को सिरे चढ़ाने के लिए भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नरेश सिरोह को जिम्मेदारी सौंपी है। संसद शीतकालीन सत्र से पूर्व मुरली मनोहर जोशी स्वयं निडाना आकर कीट ज्ञान मॉडल को देखेंगे। इस दौरान वह यहां के किसानों के साथ बैठक कर उनके अनुभव भी जानेंगे। वहीं कीट ज्ञान के इस मॉडल को प्रोत्साहित करने के लिए भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी हरियाणा के राज्यपाल प्रो. कप्तान ङ्क्षसह सोलंकी तथा मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को चिट्टी भी लिखेंगे ताकि फसलों में अंधाधुंध प्रयोग होने वाले कीटनाशकों को रोककर खाने की थाली को जहरमुक्त बनाया जा सके। 


गौरतलब है कि गत दिवस डॉ. सुरेंद्र दलाल कीट साक्षरता मिशन का एक प्रतिनिधि मंडल भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नरेश सिरोही के नेतृत्व में भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी से दिल्ली स्थित उनके आवास पर मिला था। इस दौरान बराह तपा के प्रधान कुलदीप ढांडा तथा समूह के प्रधान रणबीर मलिक ने भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी के साथ अपने अनुभव सांझा करते हुए बताया कि खाने की थाली को जहरमुक्त बनाने के लिए वर्ष 2008 में जींद जिले के निडाना गांव में कीट साक्षरता के अग्रदूत डॉ. सुरेंद्र दलाल ने यहां के किसानों के साथ मिलकर कीटों पर शोध शुरू किया था। इस दौरान उन्होंने किसानों के साथ मिलकर 206 किस्म के कीटों की पहचान की। इनमें 163 किस्म के मांसाहारी तथा 43 किस्म के शाकाहारी कीट शामिल हैं। उन्होंने बताया कि न तो कीट हमारे मित्र होते हैं और न ही शत्रु। पौधे अपनी जरूरत के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार की गंध छोड़कर कीटों को आकर्षित करते हैं। जब उनकी जरूरत पूरी हो जाती है तो वह शाकाहारी कीटों को नियंत्रित करने के लिए मांसाहारी कीटों को आकर्षित कर लेते हैं। मांसाहारी कीट शाकाहारी कीटों को खाकर उन्हें स्वयं ही नियंत्रित कर लेते हैं। शाकाहारी कीटों को नियंत्रित करने के लिए कीटनाशकों की कोई जरूरत नहीं है। उन्होंने बताया कि फसल में कीटनाशकों का प्रयोग करने से कीटों की संख्या कम होने की बजाए बढ़ती है। क्योंकि कीटनाशकों के छिड़काव से पौधे की गंध छोडऩे की क्षमता प्रभावित होती है। उन्होंने यह भी बताया कि फसलों में अत्याधिक कीटनाशकों का प्रयोग होने के कारण फसलों में जहर का स्तर लगातार बढ़ रहा है। हमारा खान-पान दूषित होने के कारण दिन-प्रतिदिन मनुष्य भिन्न-भिन्न प्रकार की बीमारियों की चपेट में आ रहा है तथा कई प्रकार की लाइलाज बीमारियां अपने पैर पसार रही हैं। रणबीर मलिक ने बताया कि वर्ष 2008 में निडाना से शुरू हुई यह मुहिम अब हरियाणा के साथ-साथ पंजाब में भी फैल चुकी है। यदि सरकार इस मुहिम को देशभर में लागू कर दे तो सरकार के हर वर्ष कीटनाशकों व रासायनिक उर्वरकों की सब्सिडी पर खर्च होने वाले करोड़ों रुपए बच जाएंगे। वहीं हमारा खान-पान भी दूषित नहीं होगा। भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने किसानों के साथ लगभग डेढ़ घंटे तक बातचीत कर व बारिकी से उनके अनुभव समझने के बाद संसद के शीतकालीन सत्र में कीटों की प्रदर्शनी लगाने तथा सांसदों को भी इस मुहिम से रूबरू करवाने का आश्वासन दिया। इसके लिए भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नरेश सिरोही को जिम्मेदारी भी सौंपी। वहीं उन्होंने हरियाणा प्रदेश के राज्यपाल कप्तान ङ्क्षसह सोलंकी तथा मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को चिट्टी लिखकर इस मुहिम को प्रोत्साहित करने का आश्वासन भी दिया। कीट ज्ञान के इस मॉडल को समझने के लिए भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी ने किसानों का जींद आने का निमंत्रण भी स्वीकार किया। भाजपा नेता सितंबर माह में स्वयं जींद आएंगे और किसानों के अनुभव सुनेंगे। 





Saturday, 24 June 2017

इंग्लैंड व अमेरिका के लोगों की पसंद बनी अटेरना की बेबी कॉर्न

खेती में अटेरना के कंवल सिंह ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बनाई पहचान
नरेंद्र कुंडू 
सोनीपत। हरियाणा के प्रतिष्ठित किसानाें की सूची में शामिल 55 वर्षीय अटेरना निवासी कंवल सिंह चौहान ने खेती के बूते अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। अपनी मेहनत के बल पर कंवल सिंह दर्जनभर से भी ज्यादा पुरस्कार हासिल कर चुका है। इतना ही नहीं गांव में ही स्थित कंवल सिंह की फूड प्रोसेसिंग कंपनी से हर रोज लगभग डेढ़ टन बेबी कॉर्न व अन्य उत्पाद इंग्लैंड व अमेरिका में सप्लाई हो रहे हैं। पर्यावरण नियंत्रण की राष्ट्रीय समिति के सदस्य कंवल सिंह चौहान ने बताया कि 1978 में पिता के देहांत के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई थी। उस समय उनकी उम्र महज 15 वर्ष थी और वह दसवीं कक्षा में पढ़ते थे। 
इसके बाद उन्होंने खेती के साथ-साथ अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। 1996 में उन्होंने राइस मिल लगाया लेकिन वहां सफलता नहीं मिली। वह पूरी तरह से कर्ज में डूब चुके थे। इसके बाद उन्हाेंने अपनी परंपरागत खेती छोड़ कर 1998 में मशरूम व बेबी कॉर्न की खेती शुरू की। मशरूम व बेबी कॉर्न से अच्छी आमदनी हुई। इसके बाद उन्होंने  कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। खेती के साथ-साथ मधु मक्खी पालन भी शुरू कर दिया। कंवल सिंह ने स्वयं के साथ-साथ दूसरे किसानाें को भी बेबी कॉर्न की खेती के लिए प्रेरित करना शुरू कर दिया। देखते ही देखते गांव के दूसरे किसानों ने भी बेबी कॉर्न की खेती शुरू कर दी। किसानाें को बेबी कॉर्न को बेचने के लिए किसी प्रकार की दिक्कत नहीं हो इसके लिए कंवल सिंह ने गांव में ही फूड प्रोसेसिंग यूनिट शुरू कर दी। जिसका उद्घाटन नार्वे के कृषि एवं खाद्य मंत्री लार्स पेडर ब्रेक ने वर्ष 2009 में किया। लगभग दो एकड़ में स्थित इस यूनिट में बेबी कॉर्न, स्वीट कॉर्न, पाइनएपल, फ्रूट कॉकटेल, मशरूम बटन, मशरूम स्लाइस सहित लगभग आठ प्रकार के उत्पाद तैयार किए जाते हैं।  इस यूनिट से प्रति दिन लगभग डेढ़ टन बेबी कॉर्न व अन्य उत्पाद इंग्लैंड व अमेरिका में निर्यात होता है। इस कार्य में उनके बड़े बेटे जैनेन्द्र जो कि फूड प्रोसेसिंग मे बीटेक हैं उनका पूरा साथ दे रहे हैं। इस समय इनके साथ 10 गांव के 136 किसान सदस्य के रूप में जुड़े हुए हैं जिनको यह न्यूनतम समर्थन मूल्य देकर उपज खरीदने का वादा करते हैं। कंवल सिंह का कहना है कि रासायन ऽाद आधारित खेती व कीटनाशकों की अधिकता खेती की लागत बढ़ा रही है। इसकी जगह यदि हम पशु आधारित तथा स्वयं द्वारा तैयार खाद का प्रयोग करें तो खेती किसानाें के लिए घाटे का सौदा नहीं रहेगी। 

व्यवसायिक खेती ने बदली किसानों की तकदीर

बेबी कॉर्न व स्वीट कॉर्न की खेती से अटेरना और मनोली के किसानों से विदेशों में भी बनाई पहचान 
नरेंद्र कुंडू 
सोनीपत।

आज खेती किसानों के लिए घाटे का सौदा बनती जा रही है। खेती में लागत अधिक होने तथा पैदावार कम होने के कारण किसान खेती से मुंह मोड़ने लगे हैं। लेकिन हरियाणा प्रदेश के सोनीपत जिले के दो गांव ऐसे हैं, जहां के किसानाें ने हरियाणा ही नहीं बल्कि पूरे एशिया के नक्शे पर अपनी सफलता की छाप छोड़ी है। दिल्ली-चंडीगढ़ नेशनल हाईवे-1 पर स्थित बहालगढ़ से महज तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित अटेरना तथा पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित मनोली के किसानाें ने खेती को व्यवसाय के तौर पर अपना लिया है। इन गांवाें के किसानों ने अपनी परंपरागत खेती को छोड़कर बेबी कॉर्न व स्वीट कॉर्न की खेती को अपनी आमदनी का जरिया बनाया है। इतना ही नहीं बेबी कॉर्न व स्वीट कॉर्न के उत्पादन में इन दोनों गांवों के किसानों ने इतनी प्रसिद्धी हासिल की है कि विदेशों से भी किसान यहां खेती का प्रशिक्षण लेने के लिए आते हैं। मनोली गांव निवासी दिनेश ने बताया कि बीएससी की  पढ़ाई के बाद से उसने नौकरी की बजाए खेती को व्यवसाय के तौर पर अपनाया। दिनेश ने बताया कि पहले उनके गांव मनोली में ज्यादातर क्षेत्र में धान की खेती होती थी। भारी मात्र में भूजल का दोहन होता था। इससे गांव का भूजल स्तर काफी नीचे चला गया था। इसको देखते हुए उसने खेती में कुछ अलग करने की ठानी। 1998 में स्ट्राबेरी की खेती शुरू की। इसके बाद उसने अपने दोस्त अरूण के साथ मिलकर स्वीट कॉर्न की खेती शुरू की। शुरूआत में मार्केटिंग को लेकर थोड़ी दिक्कत हुई लेकिन बाद में फूड प्रोसेसिंग कंपनियों के साथ सीधे सम्पर्क होने से उनकी मार्केट की समस्या भी खत्म हो गई। देखते ही देखते स्वीट कॉर्न की खेती उनके लिए फायदे का सौदा साबित होने लगी। इसके बाद उन्होंने दूसरे किसानाें को भी इसके लिए प्रेरित किया। उन्हाेंने बताया कि 4500 की आबादी वाले इस गांव के अधिकतर किसान स्वीट कॉर्न की खेती कर रहे हैं। इससे फसलाें में कीटनाशकाें का प्रयोग बिल्कुल बंद हो गया। पानी की लागत कम होने से भूजल का दोहन बंद हो गया। जमीन का स्वास्थ्य स्तर सुधरने लगा। वातावरण स्वच्छ होने लगा। गांव में ही लोगाें को रोजगार मिलने से गांव से लोगाें का पलायन बंद हो गया। पशुआें को पूरे साल हरा चारा मिलता है, इससे पशुओं के दूध उत्पादन क्षमता में भी बढ़ोतरी हुई है।

अब बागवानी के लिए भी करेंगे किसानों को प्रेरित 
किसान अरुण, दिनेश, जयद्रथ, प्रवीण व पवन ने बताया कि उन्होंने किसानों का एक ग्रुप बनाया हुआ है। इस ग्रुप में शामिल सभी किसानों द्वारा अपने खेतों में पॉली हाऊस भी लगाए हुए हैं। पॉली हाऊस में उगने वाली सब्जियों में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग करने की बजाए बॉयोगैस से निर्मित देशी खाद का प्रयोग करते हैं। इस खाद को घोल कर ड्रिप के जरिये पानी के साथ सब्जियों पर इसका छिड़काव किया जाता है। इसके अलावा कुछ किसानों द्वारा बाग भी लगाए हुए हैं। सब्जियों व स्वीट कॉर्न की खेती के साथ-साथ अब वह किसानाें को बागवानी के लिए भी प्रेरित कर रहे हैं।
फसल चक्र बदलने से इन गांवों को यह हुआ फायदा
 फसल चक्र में बदलाव से जमीन का स्वास्थ्य स्तर सुधरा है। धान की रोपाई बंद होने से पानी की बचत हुई है। पशुओं के लिए हर माह हरा चारा प्रचुर मात्र में उपलब्ध रहता है। कीटनाशकों का प्रयोग बंद हो गया है। वातावरण में सुधार हुआ है। गांव में ही लोगों को रोजगार मिलने से गांव के लोगों का पलायन रूका है। कैश की फसल का चलन बढ़ने से गांव का आर्थिक स्तर सुधरा है। फूड प्रोसेसिंग कंपनियाें द्वारा सब्जियों के उत्पादन के लिए सीधे किसानों से संपर्क किए जाने से किसानाें को उत्पाद बेचने के लिए एक नई मार्केट उपलब्ध हो गई। बाजार भाव कम रहने के दिनों में प्रोसेसिंग प्लांट में फसल बेचने से आर्थिक नुक्सान नहीं होता।
किसान की फूड, फीड, फोडर, फ्रयूल, फाइनेंस की चिंता खत्म
सेवानिवृत्त कृषि वैज्ञानिक डॉ- साईं दास ने कहा कि अटेरना व मनोली के किसानों ने आस-पास के क्षेत्रें में भी रोजगार की असीमित संभावनाएं पैदा कर यह दिखा दिया है कि स्वप्न केवल देखने के लिए ही नहीं होते किंतु उन्हें धरातल पर भी उतारा जा सकता है। आने वाला समय मक्का खेती का है।। क्योंकि इसमें पानी की लागत तथा रसायनिक खाद एवं कीटनाशकों का प्रयोग नामात्र है और आर्थिक लाभ अधिकतम है। किसान को फूड, फीड, फोडर, फ्रयूल, फाइनेंस की चिंता करने की भी आवश्यकता नहीं है। यदि हम खेती में संतुलित पोषक तत्व डालते रहें तो हमें अनावश्यक खर्चों से निजात मिल जाएगी।